श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
नैतच्चित्रं त्वयि क्षत्तर्बादरायणवीर्यजे ।
गृहीतोऽनन्यभावेन यत्त्वया हरिरीश्वर: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
न—कभी नहीं; एतत्—ऐसे प्रश्न; चित्रम्—अत्यन्त आश्चर्यजनक; त्वयि—तुममें; क्षत्त:—हे विदुर; बादरायण—व्यासदेव के; वीर्य-जे—वीर्य से उत्पन्न; गृहीत:—स्वीकृत; अनन्य-भावेन—विचार से हटे बिना; यत्—क्योंकि; त्वया—तुम्हारे द्वारा; हरि:— भगवान्; ईश्वर:—भगवान् ।.
 
अनुवाद
 
 हे विदुर, यह तनिक भी आश्चर्यप्रद नहीं है कि तुमने अनन्य भाव से भगवान् को इस तरह स्वीकार कर लिया है, क्योंकि तुम व्यासदेव के वीर्य से उत्पन्न हो।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर विदुर के जन्म को लेकर महान् वंश तथा कुलीन जन्म का मूल्यांकन किया गया है। मनुष्य का अनुशीलन तभी शुरू हो जाता है जब पिता अपना वीर्य माता के गर्भ में स्थापित करता है। जीव अपने कर्म के स्तर के अनुसार विशिष्ट पिता के वीर्य में अवस्थित कर दिया जाता है और चूँकि विदुर सामान्य जीव न थे, अतएव उन्हें व्यास के वीर्य से जन्म लेने का अवसर प्रदान किया गया। मनुष्य का जन्म महान् विज्ञान है, अतएव वैदिक अनुष्ठान के अनुसार वीर्यस्थापन का संस्कार जो गर्भाधान संस्कार कहलाता है, उत्तम जनसंख्या को उत्पन्न करने के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मूल समस्या जनता की वृद्धि को रोकने की नहीं, अपितु विदुर, व्यास तथा मैत्रेय जैसी अच्छी संतति उत्पन्न करने की है। यदि जन्म सम्बन्धी समस्त सावधानियों के साथ बच्चे मनुष्य के रूप में उत्पन्न हों तो जनसंख्या-वृद्धि रोकने की कोई आवश्यकता नहीं है। तथाकथित जन्म-नियंत्रण (संतति-निरोध) न केवल दूषित है, अपितु निरर्थक भी है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥