श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक
विदुर उवाच
सुखाय कर्माणि करोति लोको
न तै: सुखं वान्यदुपारमं वा ।
विन्देत भूयस्तत एव दु:खं
यदत्र युक्तं भगवान् वदेन्न: ॥ २ ॥
 
शब्दार्थ
विदुर: उवाच—विदुर ने कहा; सुखाय—सुख प्राप्त करने के लिए; कर्माणि—सकाम कर्म; करोति—हर कोई करता है; लोक:—इस जगत में; न—कभी नहीं; तै:—उन कर्मों के द्वारा; सुखम्—कोई सुख; वा—अथवा; अन्यत्—भिन्न रीति से; उपारमम्—तृप्ति; वा—अथवा; विन्देत—प्राप्त करता है; भूय:—इसके विपरीत; तत:—ऐसे कार्यों के द्वारा; एव—निश्चय ही; दु:खम्—कष्ट; यत्—जो; अत्र—परिस्थितिवश; युक्तम्—सही मार्ग; भगवान्—हे महात्मन्; वदेत्—कृपया प्रकाशित करें; न:—हमको ।.
 
अनुवाद
 
 विदुर ने कहा : हे महर्षि, इस संसार का हर व्यक्ति सुख प्राप्त करने के लिए सकाम कर्मों में प्रवृत्त होता है, किन्तु उसे न तो तृप्ति मिलती है न ही उसके दुख में कोई कमी आती है। विपरीत इसके ऐसे कार्यों से उसके दुख में वृद्धि होती है। इसलिए कृपा करके हमें इसके विषय में हमारा मार्गदर्शन करें कि असली सुख के लिए कोई कैसे रहे?
 
तात्पर्य
 विदुर ने मैत्रेय से कुछ सामान्य प्रश्न पूछे, किन्तु उनका मूल अभिप्राय यह नहीं था। उद्धव ने विदुर से मैत्रेय मुनि के पास जाकर भगवान् के नाम, यश, गुण, रूप, लीलाओं, पार्षद इत्यादि के सारे सत्यों के विषय में जिज्ञासा करने के लिए कहा था, अतएव जब विदुर मैत्रेय के पास पहुँचे तो उन्हें केवल भगवान् के विषय में पूछना चाहिए था। किन्तु स्वाभाविक विनयशीलतावश उन्होंने एक दम भगवान् के विषय में नहीं पूछा, प्रत्युत ऐसे विषय पर प्रश्न पूछा जो जनसामान्य के लिए अत्यधिक महत्त्व का हो सकता था। कोई सामान्य मनुष्य भगवान् को नहीं समझ सकता। सर्वप्रथम, उसे माया के वशीभूत अपने जीवन की असली स्थिति जाननी चाहिए। मोह में आकर मनुष्य सोचता है कि वह मात्र सकाम कर्मों के द्वारा सुखी हो सकता है, किन्तु होता यह है कि मनुष्य कर्म तथा कर्म-फल के जंजाल में और अधिक उलझता जाता है और जीवन की समस्या का कोई समाधान नहीं खोज पाता। इस सन्दर्भ में एक सुन्दर गीत है “जीवन का सारा सुख प्राप्त करने की महती इच्छा के कारण, मैने यह घर बनाया किन्तु दुर्भाग्यवश सारी योजना ध्वस्त हो गई, क्योंकि घर में अप्रत्याशित रूप से आग लगा दी गई।” प्रकृति का नियम ऐसा ही है। हर व्यक्ति भौतिक जगत में योजना बनाकर रहने से सुखी बनना चाहता है, किन्तु प्रकृति का नियम इतना क्रूर है कि यह उस योजना में आग लगा देता है। सकामकर्मी अपनी योजनाओं से सुखी नहीं रहता, न ही सुख के लिए उसकी निरन्तर दौड़धूप से उसे कोई तृप्ति मिलती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥