श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
माण्डव्यशापाद्भगवान् प्रजासंयमनो यम: ।
भ्रातु: क्षेत्रे भुजिष्यायां जात: सत्यवतीसुतात् ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
माण्डव्य—माण्डव्य नामक महर्षि; शापात्—उसके शाप से; भगवान्—अत्यन्त शक्तिशाली; प्रजा—जन्म लेने वाला; संयमन:—मृत्यु का नियंत्रक; यम:—यमराज नाम से विख्यात; भ्रातु:—भाई की; क्षेत्रे—पत्नी में; भुजिष्यायाम्—रखैल; जात:—उत्पन्न; सत्यवती—सत्यवती (विचित्रवीर्य तथा व्यासदेव की माता); सुतात्—पुत्र (व्यासदेव) से ।.
 
अनुवाद
 
 मैं जानता हूँ कि तुम माण्डव्य मुनि के शाप के कारण विदुर बने हो और इसके पूर्व तुम जीवों की मृत्यु के पश्चात उनके महान् नियंत्रक राजा यमराज थे। तुम सत्यवती के पुत्र व्यासदेव द्वारा उसके भाई की रखैल पत्नी से उत्पन्न हुए थे।
 
तात्पर्य
 माण्डव्य मुनि एक महान ऋषि थे (देखें भागवत १.१३.१) और विदुर अपने पूर्वजन्म में नियंत्रक यमराज थे, जो जीवों की मृत्यु के बाद उनका कार्यभार सँभालता है। इस भौतिक जगत में रहने वाले जीवों की तीन दशाएँ हैं—जन्म, भरण-पोषण तथा मृत्यु। एक बार मृत्यु के पश्चात् नियुक्त नियंत्रक के रूप में यमराज ने माण्डव्य मुनि को उनके बचपन के दुराचार के लिए दण्ड दिया और उन्हें भाले से छेदे जाने का आदेश दे दिया। इस अनुचित दण्ड के लिए यमराज पर क्रुद्ध होकर माण्डव्य ने उसे शूद्र बनने का शाप दे दिया। इस तरह यमराज ने विचित्रवीर्य की रखैल पत्नी के गर्भ से विचित्रवीर्य के भाई व्यासदेव के वीर्य से जन्म लिया। व्यासदेव सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न भीष्मदेव के पिता शान्तनु के पुत्र थे। विदुर का यह रहस्यमय इतिहास मैत्रेय मुनि को ज्ञात था, क्योंकि वे व्यासदेव के समकालीन मित्र थे। रखैल पत्नी के गर्भ से जन्म होने के बावजूद विदुर ने महान् भगवद्भक्त होने की सर्वोच्च प्रतिभा का उत्तराधिकार प्राप्त किया, क्योंकि उनके माता-पिता महान् थे और उनका सम्बन्ध महान् था। ऐसे महान् वंश में जन्म लेना भक्तिमय जीवन प्राप्त करने के लिए लाभप्रद है। विदुर को यह अवसर अपनी पूर्वजन्म की महानता के कारण प्राप्त हो सका।
 
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