श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक
भवान् भगवतो नित्यं सम्मत: सानुगस्य ह ।
यस्य ज्ञानोपदेशाय मादिशद्भगवान् व्रजन् ॥ २१ ॥
 
शब्दार्थ
भवान्—आप ही; भगवत:—भगवान् के; नित्यम्—नित्य; सम्मत:—मान्य; स-अनुगस्य—संगियों में से एक; ह—रहे हैं; यस्य—जिसका; ज्ञान—ज्ञान; उपदेशाय—उपदेश के लिए; मा—मुझको; आदिशत्—इस तरह आदिष्ट; भगवान्—भगवान् ने; व्रजन्—अपने धाम जाते हुए ।.
 
अनुवाद
 
 आप भगवान् के नित्यसंगियों में से एक हैं जिनके लिए भगवान् अपने धाम वापस जाते समय मेरे पास उपदेश छोड़ गये हैं।
 
तात्पर्य
 मृत्यु के पश्चात् जीवन के महान् नियंत्रक यमराज जीवों के अगले जीवन के भाग्य का निर्णय करते हैं। वे निश्चय ही भगवान् के प्रतिनिधियों में सर्वाधिक विश्वसनीय हैं। ऐसे विश्वसनीय पद उन महान् भगवद्भक्तों को दिये जाते हैं, जो वैकुण्ठ में भगवान् के नित्य संगियों के समान होते हैं। चूंकि विदुर उनमें से एक थे, अतएव वैकुण्ठ वापस जाते समय भगवान् मैत्रेय
के पास विदुर के लिए उपदेश छोड़ते गये। सामान्यतया भगवान् के वैकुण्ठ के संगी भौतिक जगत में नहीं आते। किन्तु कभी- कभी भगवान् के आदेश से वे, किसी प्रशासनिक पद का भार सँभालने नहीं, अपितु भगवान् का सान्निध्य प्राप्त करने अथवा मानव समाज में भगवान् के सन्देश का प्रसार करने के लिए आते हैं। ऐसे शक्तिप्रदत्त प्रतिनिधि शक्त्यावेश अवतार कहलाते हैं।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥