श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक
स वा एष तदा द्रष्टा नापश्यद् द‍ृश्यमेकराट् ।
मेनेऽसन्तमिवात्मानं सुप्तशक्तिरसुप्तद‍ृक् ॥ २४ ॥
 
शब्दार्थ
स:—भगवान्; वा—अथवा; एष:—ये सभी; तदा—उस समय; द्रष्टा—देखने वाला; न—नहीं; अपश्यत्—देखा; दृश्यम्— विराट सृष्टि; एक-राट्—निर्विवाद स्वामी; मेने—इस तरह सोचा; असन्तम्—अविद्यमान; इव—सदृश; आत्मानम्—स्वांश रूप; सुप्त—अव्यक्त; शक्ति:—भौतिक शक्ति; असुप्त—व्यक्त; दृक्—अन्तरंगा शक्ति ।.
 
अनुवाद
 
 हर वस्तु के निर्विवाद स्वामी भगवान् ही एकमात्र द्रष्टा थे। उस समय विराट जगत का अस्तित्व न था, अत: अपने स्वांशों तथा भिन्नांशों के बिना वे अपने को अपूर्ण अनुभव कर रहे थे। तब भौतिक शक्ति सुसुप्त थी जबकि अन्तरंगा शक्ति व्यक्त थी।
 
तात्पर्य
 भगवान् परम द्रष्टा हैं, क्योंकि उनकी चितवन मात्र से भौतिक शक्ति विराट सृष्टि के लिए गतिशील हुई। उस समय द्रष्टा तो था, किन्तु बहिरंगा शक्ति, जिस पर भगवान् अपनी चितवन फेरते हैं, उपस्थित नहीं थी। उन्हें कुछ अधूरा सा लग रहा था जिस तरह पति को पत्नी की अनुपस्थिति में अकेलापन अनुभव होता है। यह कथात्मक उपमा है। भगवान् ने उन बद्ध आत्माओं को जो विस्मृति में सुप्त थीं, दूसरा अवसर प्रदान करने के लिए विराट सृष्टि का सृजन करना चाहा। विराट सृष्टि बद्धजीवों को भगवद्धाम वापस जाने का अवसर प्रदान करती है और यही इसका मुख्य उद्देश्य है। भगवान् इतने कृपालु हैं कि ऐसी सृष्टि की अनुपस्थिति में ऐसा अनुभव करते हैं कि जैसे किसी वस्तु की कमी हो और इस तरह सृष्टि की रचना होती है। यद्यपि अन्तरंगा शक्ति की सृष्टि व्यक्त थी, किन्तु दूसरी शक्ति सुप्त प्रतीत हो रही थी। भगवान् उसे जगाकर गतिशील बनाना चाहते थे जिस तरह पति अपनी सोई हुई पत्नी को रमण के लिए जगाना चाहता है। यह तो सुप्त शक्ति पर भगवान् का अनुग्रह है कि वे उसे रमण के लिए जागृत देखना चाहते हैं जिस तरह अन्य पत्नियाँ जागृत हैं। सारी प्रक्रिया सुप्त बद्धजीवों को आध्यात्मिक चेतना के असली जीवन में लाने की है, जिससे वे उसी तरह पूर्ण बन सकें जिस तरह कि वैकुण्ठलोक की नित्यमुक्त आत्माएँ। चूँकि भगवान् सच्चिदानन्द विग्रह हैं, अतएव वे आनन्दमय रस में अपनी विभिन्न शक्तियों के हर भिन्नांश को भागीदार बनाना चाहते हैं, क्योंकि भगवान् की नित्य रासलीला में भगवान् के साथ सम्मिलित होना सर्वोच्च जागृत अवस्था है, जो आध्यात्मिक आनन्द तथा नित्य ज्ञान से परिपूर्ण है।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥