श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
सा वा एतस्य संद्रष्टु: शक्ति: सदसदात्मिका ।
माया नाम महाभाग ययेदं निर्ममे विभु: ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
सा—वह बहिरंगा शक्ति; वा—अथवा है; एतस्य—भगवान् की; संद्रष्टु:—पूर्ण द्रष्टा की; शक्ति:—शक्ति; सत्-असत्- आत्मिका—कार्य तथा कारण दोनों रूप में; माया नाम—माया नामक; महा-भाग—हे भाग्यवान; यया—जिससे; इदम्—यह भौतिक जगत; निर्ममे—निर्मित किया; विभु:—सर्वशक्तिमान ने ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् द्रष्टा हैं और बहिरंगा शक्ति, जो दृष्टिगोचर है, विराट जगत में कार्य तथा कारण दोनों रूप में कार्य करती है। हे महाभाग विदुर, यह बहिरंगा शक्ति माया कहलाती है और केवल इसी के माध्यम से सम्पूर्ण भौतिक जगत सम्भव होता है।
 
तात्पर्य
 माया कहलाने वाली भौतिक प्रकृति ब्रह्माण्डों का भौतिक तथा सक्षम कारण है, किन्तु पृष्ठभूमि में इन सभी कार्यों के लिए भगवान् चेतनास्वरूप हैं। जिस तरह व्यष्टि शरीर में चेतना ही शरीर की समस्त शक्तियों का स्रोत होती है, उसी तरह भगवान् की परम चेतना भौतिक प्रकृति में समस्त शक्तियों की स्रोत है। इसकी पुष्टि भगवद्गीता (९.१०) में इस प्रकार हुई है—

मयाध्यक्षेण प्रकृति: सूयते सचराचरम्।

हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥

“भौतिक प्रकृति की समस्त शक्तियों में अन्तिम अधीक्षक के रूप में भगवान् का हाथ रहता है। इस परम कारण के फलस्वरूप ही भौतिक प्रकृति के सारे कार्य सुनियोजित एवं व्यवस्थित प्रतीत होते हैं और सारी वस्तुएँ नियमित रूप से विकसित होते जाती हैं।”

 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥