श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक
महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणादहंतत्त्वं व्यजायत ।
कार्यकारणकर्त्रात्मा भूतेन्द्रियमनोमय: ।
वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिधा ॥ २९ ॥
 
शब्दार्थ
महत्—महान्; तत्त्वात्—कारणस्वरूप सत्य से; विकुर्वाणात्—रूपान्तरित होने से; अहम्—मिथ्या अहंकार; तत्त्वम्—भौतिक सत्य; व्यजायत—प्रकट हुआ; कार्य—प्रभाव; कारण—कारण; कर्तृ—कर्ता; आत्मा—आत्मा या स्रोत; भूत—भौतिक अवयव; इन्द्रिय—इन्द्रियाँ; मन:-मय:—मानसिक धरातल पर मँडराता; वैकारिक:—सतोगुण; तैजस:—रजोगुण; च—तथा; तामस:—तमोगुण; च—तथा; इति—इस प्रकार; अहम्—मिथ्या अहंकार; त्रिधा—तीन प्रकार ।.
 
अनुवाद
 
 महत् तत्त्व या महान् कारण रूप सत्य मिथ्या अहंकार में परिणत होता है, जो तीन अवस्थाओं में—कारण, कार्य तथा कर्ता के रूप में—प्रकट होता है। ऐसे सारे कार्य मानसिक धरातल पर होते हैं और वे भौतिक तत्त्वों, स्थूल इन्द्रियों तथा मानसिक चिन्तन पर आधारित होते हैं। मिथ्या अहंकार तीन विभिन्न गुणों—सतो, रजो तथा तमो—में प्रदर्शित होता है।
 
तात्पर्य
 शुद्ध जीवात्मा अपने आदि आध्यात्मिक अस्तित्व में भगवान् के नित्यदास के रूप में अपनी स्वाभाविक स्थिति से पूर्णतया सचेत रहता है। सारी आत्माएँ जो ऐसी शुद्ध चेतनाओं में स्थित होती हैं मुक्त होती हैं, अतएव वे आध्यात्मिक आकाश में विभिन्न वैकुण्ठलोकों में आनन्द तथा ज्ञान में नित्य निवास करती हैं। जब भौतिक सृष्टि प्रकट होती है, तो यह उनके निमित्त नहीं होती। नित्य मुक्त आत्माएँ नित्यमुक्त कहलाती हैं जिनका भौतिक सृष्टि से कोई वास्ता नहीं रहता। भौतिक सृष्टि उन विद्रोही आत्माओं के निमित्त है, जो भगवान् की अधीनता स्वीकार करने को तैयार नहीं होतीं। मिथ्या स्वामित्व की यह भावना मिथ्या अहंकार कहलाती है। यह प्रकृति के तीन गुणों में व्यक्त होती है और यह केवल मानसिक चिन्तन में विद्यमान रहती है। जो लोग सतोगुणी होते हैं, वे प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर समझते हैं और इस तरह वे उन शुद्ध भक्तों का परिहास करते हैं, जो भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लगे रहने का प्रयास करते हैं। जो लोग रजोगुण के कारण गर्वित रहते हैं, वे प्रकृति पर अनेक प्रकार से प्रभुत्व जताने का प्रयास करते हैं। इनमें से कुछ लोग उपकारी कार्यों में लगे रहते हैं मानो वे अपनी मानसिक चिन्तनशील योजनाओं के द्वारा अन्यों का कल्याण करने के लिए नियुक्त एजेण्ट हों। ऐसे लोग लौकिक उपकार के आदर्श नियमों को स्वीकार करते हैं, किन्तु उनकी योजनाएँ मिथ्या अहंकार के आधार पर बनती हैं। यह मिथ्या अहंकार भगवान् से एकाकार होने की सीमा तक विस्तार करता है। अहंकारी बद्धात्माओं की अन्तिम श्रेणी—जो तमोगुणी होती है—स्थूल शरीर के साथ आत्मा की पहचान करने के कारण दिग्भ्रमित रहती है। इस तरह उनके सारे कार्यकलाप केवल शरीर के चारों ओर केन्द्रित रहते हैं। इन सारे व्यक्तियों को मिथ्या अहंकारवादी विचारों से खिलवाड़ करने का अवसर प्रदान किया जाता है, किन्तु साथ ही भगवान् इतने दयालु हैं कि वे उन्हें भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत जैसे शास्त्रों की सहायता लेने का अवसर प्रदान करते हैं जिससे वे कृष्णविज्ञान को समझ सकें और अपने जीवन सफल बना सकें। इसलिए सम्पूर्ण भौतिक सृष्टि उन मिथ्या अंहकारवादी जीवों के लिए होती है, जो प्रकृति के गुणों के अधीन विभिन्न मोहों के अन्तर्गत मानसिक धरातल पर मँडराते रहते हैं।
 
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