श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक
तामसो भूतसूक्ष्मादिर्यत: खं लिङ्गमात्मन: ॥ ३२ ॥
 
शब्दार्थ
तामस:—तमोगुण से; भूत-सूक्ष्म-आदि:—सूक्ष्म इन्द्रिय विषय; यत:—जिससे; खम्—आकाश; लिङ्गम्—प्रतीकात्मक स्वरूप; आत्मन:—परमात्मा का ।.
 
अनुवाद
 
 आकाश ध्वनि का परिणाम है और ध्वनि अहंकारात्मक काम का रूपान्तर (विकार) है। दूसरे शब्दों में आकाश परमात्मा का प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व है।
 
तात्पर्य
 वैदिक स्तुतियों में कहा गया है—एतस्माद् आत्मन: आकाश: सम्भूत:। आकाश परमात्मा की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। जो लोग रजो
तथा तमो गुणों में अहंकारी है वे भगवान् की अनुभूति नहीं कर सकते। उनके लिए आकाश परमात्मा की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥