श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
अनिलोऽपि विकुर्वाणो नभसोरुबलान्वित: ।
ससर्ज रूपतन्मात्रं ज्योतिर्लोकस्य लोचनम् ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
अनिल:—वायु; अपि—भी; विकुर्वाण:—रूपान्तरित होकर; नभसा—आकाश; उरु-बल-अन्वित:—अत्यन्त शक्तिशाली; ससर्ज—उत्पन्न किया; रूप—रूप; तत्-मात्रम्—इन्द्रिय अनुभूति, तन्मात्रा; ज्योति:—बिजली; लोकस्य—संसार के; लोचनम्—देखने के लिए प्रकाश ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् अतीव शक्तिशाली वायु ने आकाश से अन्त:क्रिया करके इन्द्रिय अनुभूति (तन्मात्रा) का रूप उत्पन्न किया और रूप की अनुभूति बिजली में रूपान्तरित हो गई जो संसार को देखने के लिए प्रकाश है।
 
 
शेयर करें
       
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥