श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक
यत्सानुबन्धेऽसति देहगेहे
ममाहमित्यूढदुराग्रहाणाम् ।
पुंसां सुदूरं वसतोऽपि पुर्यां
भजेम तत्ते भगवन् पदाब्जम् ॥ ४४ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—चूँकि; स-अनुबन्धे—पाश में बँधने से; असति—इस तरह होकर; देह—स्थूल शरीर; गेहे—घर में; मम—मेरा; अहम्— मैं; इति—इस प्रकार; ऊढ—महान्, गम्भीर; दुराग्रहाणाम्—अवांछित उत्सुकता; पुंसाम्—मनुष्यों की; सु-दूरम्—काफी दूर; वसत:—रहते हुए; अपि—यद्यपि; पुर्याम्—शरीर में; भजेम—पूजा करें; तत्—इसलिए; ते—तुम्हारे; भगवन्—हे भगवान्; पद-अब्जम्—चरणकमल ।.
 
अनुवाद
 
 हे प्रभु, जो लोग नश्वर शरीर तथा बन्धु-बाँधवों के प्रति अवांछित उत्सुकता के द्वारा पाशबद्ध हैं और जो लोग “मेरा” तथा “मैं” के विचारों से बँधे हुए हैं, वे आपके चरणकमलों का दर्शन नहीं कर पाते यद्यपि आपके चरणकमल उनके अपने ही शरीरों में स्थित होते हैं। किन्तु हम आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण करें।
 
तात्पर्य
 जीवन का सम्पूर्ण वैदिक दर्शन यही है कि स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरों के भौतिक बन्धन से छुटकारा पाया जाय जिसके कारण मनुष्य कष्टमय गर्हित जीवन बिताता रहता है। यह भौतिक शरीर तब तक चलता जाता है जब तक मनुष्य भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताने की मिथ्या धारणा से विरत नहीं हो जाता। भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जताने की यह प्रेरणा “मेरा” तथा “मैं” का बोध है। “मैं सारे विश्व का सर्वेसर्वा हूँ। मेरे पास बहुत सी वस्तुएँ हैं और मैं अधिकाधिक वस्तुओं का स्वामी बनूँगा। सम्पत्ति तथा शिक्षा के मामले में मुझसे बढक़र कौन हो सकता है? मैं स्वामी हूँ और मैं ईश्वर हूँ। मेरे अतिरिक्त और है ही कौन?” ये सारे विचार अहं मम दर्शन अर्थात् “मैं ही सब कुछ हूँ” को प्रतिबिम्बित करते हैं। ऐसी जीवनधारणा से संचालित व्यक्ति भव-बन्धन से कभी मुक्ति नहीं पा सकते। किन्तु यदि कोई केवल कृष्णकथा सुनने के लिए राजी हो सके तो संसार के कष्टों से निरन्तर तिरस्कृत व्यक्ति भी बन्धन से छुटकारा पा सकता है। इस कलियुग में कृष्णकथा सुनने की प्रक्रिया अवांछित पारिवारिक स्नेह से छुटकारा पाने और इस तरह जीवन में स्थायी स्वतंत्रता प्राप्त करने का सबसे प्रभावशाली साधन है। कलियुग पापपूर्ण कर्मफलों से ओत-प्रोत है और लोग इस युग के गुणों में अधिकाधिक लिप्त है, किन्तु कृष्णकथा के श्रवण तथा कीर्तन मात्र से मनुष्य का भगवद्धाम वापस जाना सुनिश्चित है। अतएव मनुष्यों को सभी तरह से एकमात्र कृष्णकथा सुनने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए जिससे उन्हें सारे कष्टों से छुटकारा मिल सके।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥