श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 5: मैत्रेय से विदुर की वार्ता  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक
तत्ते वयं लोकसिसृक्षयाद्य
त्वयानुसृष्टास्त्रिभिरात्मभि: स्म ।
सर्वे वियुक्ता: स्वविहारतन्त्रं
न शक्नुमस्तत्प्रतिहर्तवे ते ॥ ४८ ॥
 
शब्दार्थ
तत्—इसलिए; ते—तुम्हारा; वयम्—हम सभी; लोक—संसार; सिसृक्षया—सृष्टि के लिए; आद्य—हे आदि पुरुष; त्वया— तुम्हारे द्वारा; अनुसृष्टा:—एक के बाद एक उत्पन्न किया जाकर; त्रिभि:—तीन गुणों द्वारा; आत्मभि:—अपने आपसे; स्म— भूतकाल में; सर्वे—सभी; वियुक्ता:—पृथक् किये हुए; स्व-विहार-तन्त्रम्—अपने आनन्द के लिए कार्यों का जाल; न—नहीं; शक्नुम:—कर सके; तत्—वह; प्रतिहर्तवे—प्रदान करने के लिए; ते—तुम्हें ।.
 
अनुवाद
 
 हे आदि पुरुष, इसलिए हम एकमात्र आपके हैं। यद्यपि हम आपके द्वारा उत्पन्न प्राणी हैं, किन्तु हम प्रकृति के तीन गुणों के प्रभाव के अन्तर्गत एक के बाद एक जन्म लेते हैं, इसीलिए हम अपने कर्म में पृथक्-पृथक् होते हैं। अतएव सृष्टि के बाद हम आपके दिव्य आनन्द के हेतु सम्मिलित रूप में कार्य नहीं कर सके।
 
तात्पर्य
 यह विराट सृष्टि भगवान् की बहिरंगा शक्ति के तीन गुणों के प्रभाव के अन्तर्गत कार्यशील है। विभिन्न प्राणी भी उसी प्रभाव के अधीन हैं, अतएव वे भगवान् को तुष्ट करने के लिए एकजुट होकर कर्म नहीं कर सकते। कार्यों की इस विविधता के कारण भौतिक जगत में कोई ऐक्य या सामंजस्य नहीं हो सकता। इसलिए सर्वोत्तम नीति यही है कि परमात्मा के लिए कर्म किया जाय। इससे वांछित ऐक्य स्थापित हो सकेगा।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥