श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 1

 
श्लोक
ऋषिरुवाच
इति तासां स्वशक्तीनां सतीनामसमेत्य स: ।
प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशाम्य गतिमीश्वर: ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
ऋषि: उवाच—मैत्रेय ऋषि ने कहा; इति—इस प्रकार; तासाम्—उनका; स्व-शक्तीनाम्—अपनी शक्ति; सतीनाम्—इस प्रकार स्थित; असमेत्य—किसी संयोग के बिना; स:—वह (भगवान्); प्रसुप्त—निलम्बित; लोक-तन्त्राणाम्—विश्व सृष्टियों में; निशाम्य—सुनकर; गतिम्—प्रगति; ईश्वर:—भगवान् ।.
 
अनुवाद
 
 मैत्रेय ऋषि ने कहा : इस तरह भगवान् ने महत्-तत्त्व जैसी अपनी शक्तियों के संयोग न होने के कारण विश्व के प्रगतिशील सृजनात्मक कार्यकलापों के निलम्बन के विषय में सुना।
 
तात्पर्य
 भगवान् की सृष्टियों में किसी तरह का अभाव नहीं है। सारी शक्तियाँ वहाँ ही प्रसुप्तावस्था में रहती हैं। किन्तु जब तक भगवान् की इच्छा से उनका संयोग
नहीं हो जाता तब तक कोई प्रगति नहीं हो सकती। सृष्टि के निलम्बित प्रगतिशील कार्य को भगवान् के निर्देशन द्वारा ही पुनरुज्जीवित किया जा सकता है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥