श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
स्मरन् विश्वसृजामीशो विज्ञापितमधोक्षज: ।
विराजमतपत्स्वेन तेजसैषां विवृत्तये ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
स्मरन्—स्मरण करते हुए; विश्व-सृजाम्—विश्व रचना का कार्यभार सँभालने वाले देवता-गण; ईश:—भगवान्; विज्ञापितम्— स्तुति किया गया; अधोक्षज:—ब्रह्म; विराजम्—विराट रूप; अतपत्—इस तरह विचार किया; स्वेन—अपनी; तेजसा—शक्ति से; एषाम्—उनके लिए; विवृत्तये—समझने के लिए ।.
 
अनुवाद
 
 परम प्रभु इस विराट जगत की रचना का कार्यभार सँभालने वाले समस्त देवताओं के परमात्मा हैं। इस तरह (देवताओं द्वारा) प्रार्थना किये जाने पर उन्होंने मन में विचार किया और तब उनको समझाने के लिए अपना विराट रूप प्रकट किया।
 
तात्पर्य
 निर्विशेषवादी लोग भगवान् के विराट रूप के प्रति विभ्रमित रहते हैं। वे सोचते हैं कि इस विराट अभिव्यक्ति के पीछे कल्पना का हाथ है, किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति कारण के महत्त्व का अनुमान परिणामों के चमत्कारों को देखकर लगा सकते हैं। उदाहरणार्थ, माता के गर्भ में मनुष्य-शरीर का विकास स्वतंत्र रूप से नहीं होता, अपितु इसलिए होता है कि शरीर के भीतर जीव या आत्मा है। जीवात्मा के बिना कोई भी भौतिक शरीर स्वयमेव न तो आकार ग्रहण कर सकता है, न विकास कर सकता है। जब कोई भौतिक वस्तु विकास प्रदर्शित करती है, तो यह समझना चाहिए कि इस अभिव्यक्ति के भीतर आध्यात्मिक आत्मा विद्यमान है। यह विराट ब्रह्माण्ड धीरे-धीरे विकसित हुआ है, जिस तरह किसी शिशु का शरीर विकास करता है। अतएव यह धारणा कि ब्रह्माण्ड के भीतर ब्रह्म प्रवेश करता है, तर्कसंगत है। जिस तरह भौतिकतावादी लोग हृदय के भीतर आत्मा तथा परमात्मा नहीं ढूँढ़ पाते उसी तरह पर्याप्त ज्ञान के अभाव में वे यह नहीं देख पाते कि परमात्मा ही ब्रह्माण्ड का कारण है। इसीलिए वैदिक भाषा में भगवान् को अवाङ्मनसागोचर: अर्थात् शब्दों तथा मनों की धारणा से परे कहा गया है।

अल्पज्ञान के कारण मानसिक चिन्तक ब्रह्म को शब्दों तथा मनों की सीमा में बाँधना चाहते हैं, किन्तु भगवान् इस तरह से नहीं जाने जा सकते। चिन्तक के पास भगवान् की अनन्तता की माप जानने के लिए पर्याप्त शब्द या मन नहीं होता। भगवान् अधोक्षज कहलाते हैं जिसका अर्थ है ऐसा पुरुष जो हमारी इन्द्रियों की कुन्द सीमित शक्ति की अनुभूति से परे है। कोई व्यक्ति मानसिक चिन्तन द्वारा भगवान् के दिव्य नाम या रूप को नहीं देख सकता। संसारी पीएच.डी. वाले अपनी सीमित इन्द्रियों से ब्रह्म के विषय में चिन्तन कर पाने में बिल्कुल असमर्थ हैं। ऐसे गर्वित पीएच.डी. लोगों द्वारा किये जानेवाले प्रयत्नों की तुलना कूपमण्डूक के दर्शन से की जा सकती हैं। जब एक कूपमण्डूक को विशाल प्रशान्त महासागर की जानकारी दी गई तो वह प्रशान्त महासागर की लम्बाई-चौड़ाई मापने या समझने के उद्देश्य से फूल कर कुप्पा हो गया। अन्त में इस मंडूक का शरीर फट गया और वह मर गया। पीएच.डी. उपाधि की विवेचना हल (कृषि) विभाग से की जा सकती है। यह उपाधि धान के खेतों को जोतने वालों के निमित्त है। धान के खेतों को जोतने वालों के द्वारा विराट जगत को तथा ऐसे अद्भुत कार्य के पीछे कारण को समझने के प्रयास की तुलना उस कूपमण्डूक से की जा सकती है, जो प्रशान्त महासागर की लंबाई चौड़ाई की माप करने का प्रयास कर रहा था।

भगवान् केवल उसी व्यक्ति के समक्ष प्रकट होते हैं, जो विनयशील होता है और उनकी दिव्य प्रेमाभक्ति में लगा रहता है। विश्व के कार्यव्यापार के तत्त्वों तथा अवयवों का नियंत्रण करने वाले देवताओं ने पथप्रदर्शन के लिए भगवान् से प्रार्थना की, अत: उन्होंने अपना विराट रूप प्रकट किया जैसाकि उन्होंने अर्जुन के अनुरोध पर किया था।

 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥