श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 12

 
श्लोक
तस्याग्निरास्यं निर्भिन्नं लोकपालोऽविशत्पदम् ।
वाचा स्वांशेन वक्तव्यं ययासौ प्रतिपद्यते ॥ १२ ॥
 
शब्दार्थ
तस्य—उसकी; अग्नि:—अग्नि; आस्यम्—मुँह; निर्भिन्नम्—इस तरह वियुक्त; लोक-पाल:—भौतिक मामलों के निदेशक; अविशत्—प्रवेश किया; पदम्—अपने-अपने पदों को; वाचा—शब्दों से; स्व-अंशेन—अपने अंश से; वक्तव्यम्—वाणी; यया—जिससे; असौ—वे; प्रतिपद्यते—व्यक्त करते हैं ।.
 
अनुवाद
 
 उनके मुख से अग्नि अथवा उष्मा विलग हो गई और भौतिक कार्य सँभालने वाले सारे निदेशक अपने-अपने पदों के अनुसार इस में प्रविष्ट हो गये। जीव उसी शक्ति से शब्दों के द्वारा अपने को अभि-व्यक्त करता है।
 
तात्पर्य
 भगवान् के विराट रूप का मुख वाचा शक्ति का उद्गम है। अग्नि तत्त्व का निदेशक इसका नियंत्रक अथवा आधिदैव है। अभि-व्यक्त
वाणियां आध्यात्म या शारीरिक कार्य हैं और वाणियों की विषयवस्तु आधिभूत तत्त्व या भौतिक उत्पादन हैं।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥