श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक
निर्भिन्नं तालु वरुणो लोकपालोऽविशद्धरे: ।
जिह्वयांशेन च रसं ययासौ प्रतिपद्यते ॥ १३ ॥
 
शब्दार्थ
निर्भिन्नम्—वियुक्त; तालु—तालू; वरुण:—वायु का नियन्ता देव; लोक-पाल:—लोकों का निदेशक; अविशत्—प्रविष्ट हुआ; हरे:—भगवान् के; जिह्वया अंशेन—जीभ के अंश से; च—भी; रसम्—स्वाद; यया—जिससे; असौ—जीव; प्रतिपद्यते— अभि-व्यक्त करता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब विराट रूप का तालू पृथक् प्रकट हुआ तो लोकों में वायु का निदेशक वरुण उसमें प्रविष्ट हुआ जिससे जीव को अपनी जीभ से हर वस्तु का स्वाद लेने की सुविधा प्राप्त है।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥