श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक
निर्भिन्ने अश्विनौ नासे विष्णोराविशतां पदम् ।
घ्राणेनांशेन गन्धस्य प्रतिपत्तिर्यतो भवेत् ॥ १४ ॥
 
शब्दार्थ
निर्भिन्ने—इस प्रकार से पृथक् हुए; अश्विनौ—दोनों अश्विनीकुमार; नासे—दोनों नथुनों के; विष्णो:—भगवान् के; आविशताम्—प्रविष्ट होकर; पदम्—पद; घ्राणेन अंशेन—आंशिक रूप से सूँघने से; गन्धस्य—गन्ध का; प्रतिपत्ति:—अनुभव; यत:—जिससे; भवेत्—होता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब भगवान् के दो नथुने पृथक् प्रकट हुए तो दोनों अश्विनीकुमार उनके भीतर अपने-अपने पदों पर प्रवेश कर गये। इसके फलस्वरूप जीव हर वस्तु की गन्ध सूँघ सकते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥