श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक
निर्भिन्ने अक्षिणी त्वष्टा लोकपालोऽविशद्विभो: ।
चक्षुषांशेन रूपाणां प्रतिपत्तिर्यतो भवेत् ॥ १५ ॥
 
शब्दार्थ
निर्भिन्ने—इस प्रकार से पृथक् होकर; अक्षिणी—आँखें; त्वष्टा—सूर्य ने; लोक-पाल:—प्रकाश का निदेशक; अविशत्—प्रवेश किया; विभो:—महान् का; चक्षुषा अंशेन—दृष्टि के अंश से; रूपाणाम्—रूपों के; प्रतिपत्ति:—अनुभव; यत:—जिससे; भवेत्—होता है ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् भगवान् के विराट रूप की दो आँखें पृथक् हो गईं। प्रकाश का निदेशक सूर्य दृष्टि के आंशिक प्रतिनिधित्व के साथ उनमें प्रविष्ट हुआ जिससे जीव रूपों को देख सकते हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥