श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
कर्णावस्य विनिर्भिन्नौ धिष्ण्यं स्वं विविशुर्दिश: ।
श्रोत्रेणांशेन शब्दस्य सिद्धिं येन प्रपद्यते ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
कर्णौ—दोनों कान; अस्य—विराट रूप के; विनिर्भिन्नौ—इस तरह पृथक् होकर; धिष्ण्यम्—नियंत्रक देव; स्वम्—अपने से; विविशु:—प्रवेश किया; दिश:—दिशाओं का; श्रोत्रेण अंशेन—श्रवण तत्त्व के साथ; शब्दस्य—ध्वनि का; सिद्धिम्—सिद्धि; येन—जिससे; प्रपद्यते—अनुभव की जाती है ।.
 
अनुवाद
 
 जब विराट रूप के कान प्रकट हुए तो सभी दिशाओं के नियंत्रक देव श्रवण तत्त्वों समेत उनमें प्रविष्ट हो गये जिससे सारे जीव सुनते हैं और ध्वनि का लाभ उठाते हैं।
 
तात्पर्य
 कान जीव के शरीर का सबसे महत्त्वपूर्ण यंत्र है। ध्वनि दूरस्थ तथा अज्ञात वस्तुओं का सन्देश ले जाने का सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम है। समस्त ध्वनि या ज्ञान की सिद्धि कान से प्रवेश करती है और मनुष्य के जीवन को पूर्ण बनाती है। सम्पूर्ण वैदिक ज्ञान एकमात्र श्रवण करके ही प्राप्त किया जाता है। इस तरह ज्ञान का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत ध्वनि है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥