श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
त्वचमस्य विनिर्भिन्नां विविशुर्धिष्ण्यमोषधी: ।
अंशेन रोमभि: कण्डूं यैरसौ प्रतिपद्यते ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
त्वचम्—चमड़ी; अस्य—विराट रूप की; विनिर्भिन्नाम्—अलग से प्रकट होकर; विविशु:—प्रविष्ट हुआ; धिष्ण्यम्—नियंत्रक देव; ओषधी:—संस्पर्श; अंशेन—अंशों के साथ; रोमभि:—शरीर के रोओं से होकर; कण्डूम्—खुजली; यै:—जिससे; असौ—जीव; प्रतिपद्यते—अनुभव करता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब चमड़ी की पृथक् अभिव्यक्ति हुई तो अपने विविध अंशों समेत संस्पर्श नियंत्रक देव उसमें प्रविष्ट हो गये। इस तरह जीवों को स्पर्श के कारण खुजलाहट तथा प्रसन्नता का अनुभव होता है।
 
तात्पर्य
 इन्द्रिय बोध के दो मुख्य अंग हैं—स्पर्श तथा खुजली। ये दोनों ही चमड़ी तथा शरीर के रोओं द्वारा नियंत्रित होते हैं। श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती के अनुसार स्पर्श का नियंत्रक देव शरीर के भीतर चलने वाला वायु है और शरीर के रोमों का नियंत्रक देव ओषध्य है। चमड़ी के लिए बोध का विषय स्पर्श है और शरीर के रोओं का बोध विषय खुजली है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥