श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
मेढ्रं तस्य विनिर्भिन्नं स्वधिष्ण्यं क उपाविशत् ।
रेतसांशेन येनासावानन्दं प्रतिपद्यते ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
मेढ्रम्—जननांग; तस्य—उस विराट रूप का; विनिर्भिन्नम्—पृथक् होकर; स्व-धिष्ण्यम्—अपना पद; क:—ब्रह्मा, आदि प्राणी; उपाविशत्—प्रविष्ट हुआ; रेतसा अंशेन—वीर्य के अंश सहित; येन—जिससे; असौ—जीव; आनन्दम्—यौन आनन्द; प्रतिपद्यते—अनुभव करता है ।.
 
अनुवाद
 
 जब विराट रूप के जननांग पृथक् हो गये तो आदि प्राणी प्रजापति अपने आंशिक वीर्य समेत उनमें प्रविष्ट हो गये और इस तरह जीव यौन आनन्द का अनुभव कर सकते हैं।
 
 
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥