श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक
गुदं पुंसो विनिर्भिन्नं मित्रो लोकेश आविशत् ।
पायुनांशेन येनासौ विसर्गं प्रतिपद्यते ॥ २० ॥
 
शब्दार्थ
गुदम्—गुदा; पुंस:—विराट रूप का; विनिर्भिन्नम्—पृथक् होकर; मित्र:—सूर्यदेव; लोक-ईश:—मित्र नामक निदेशक; आविशत्—प्रविष्ट हुआ; पायुना अंशेन—आंशिक वायु के साथ; येन—जिससे; असौ—जीव; विसर्गम्—मलमूत्र त्याग; प्रतिपद्यते—सम्पन्न करता है ।.
 
अनुवाद
 
 फिर विसर्जन मार्ग पृथक् हुआ और मित्र नामक निदेशक विसर्जन के आंशिक अंगों समेत उसमें प्रविष्ट हो गया। इस प्रकार जीव अपना मल-मूत्र विसर्जित करने में सक्षम हैं।
 
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥