श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक
आत्मानं चास्य निर्भिन्नमभिमानोऽविशत्पदम् ।
कर्मणांशेन येनासौ कर्तव्यं प्रतिपद्यते ॥ २५ ॥
 
शब्दार्थ
आत्मानम्—मिथ्या अहंकार; च—भी; अस्य—विराट रूप का; निर्भिन्नम्—पृथक् से प्रकट होकर; अभिमान:—मिथ्या पहचान; अविशत्—प्रविष्ट हुआ; पदम्—पद पर; कर्मणा—कर्म द्वारा; अंशेन—अंशत:; येन—जिससे; असौ—जीव; कर्तव्यम्—करणीय कार्यकलाप; प्रतिपद्यते—करता है ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् विराट रूप का भौतिकतावादी अहंकार पृथक् से प्रकट हुआ और इसमें मिथ्या अंहकार के नियंत्रक रुद्र ने अपनी निजी आंशिक क्रियाओं समेत प्रवेश किया जिससे जीव अपना लक्ष्यित कर्तव्य पूरा करता है।
 
तात्पर्य
 भौतिकतावादी स्वरूप का मिथ्या अहंकार शिवजी के अवतार रुद्र देवता द्वारा नियंत्रित होता है। रुद्र भगवान् के अवतार हैं, जो भौतिक प्रकृति के अन्तर्गत तमोगुण का नियंत्रण करते हैं। मिथ्या अहंकार की क्रियाएँ शरीर तथा मन के लक्ष्य पर आधारित होती हैं। मिथ्या अहंकार द्वारा नियंत्रित अधिकांश व्यक्ति शिवजी द्वारा नियंत्रित होते हैं। जब मनुष्य अज्ञान के सूक्ष्म रूप तक पहुँच जाता है, तो वह भ्रमवश अपने को परमेश्वर मानने लगता है। बद्ध आत्मा की अहंकारमय धारणा उस भ्रामिक माया का अन्तिम पाश है, जो सम्पूर्ण भौतिक जगत को नियंत्रित करती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥