श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक
शीर्ष्णोऽस्य द्यौर्धरा पद्‍भ्यां खं नाभेरुदपद्यत ।
गुणानां वृत्तयो येषु प्रतीयन्ते सुरादय: ॥ २७ ॥
 
शब्दार्थ
शीर्ष्ण:—सिर; अस्य—विराट रूप का; द्यौ:—स्वर्गलोक; धरा—पृथ्वीलोक; पद्भ्याम्—उसके पैरों पर; खम्—आकाश; नाभे:—नाभि से; उदपद्यत—प्रकट हुआ; गुणानाम्—तीनों गुणों के; वृत्तय:—फल; येषु—जिनमें; प्रतीयन्ते—प्रकट होते हैं; सुर-आदय:—देवता इत्यादि ।.
 
अनुवाद
 
 तत्पश्चात् विराट रूप के सिर से स्वर्गलोक, उसके पैरों से पृथ्वीलोक तथा उसकी नाभि से आकाश पृथक्-पृथक् प्रकट हुए। इनके भीतर भौतिक प्रकृति के तीन गुणों के रूप में देवता इत्यादि भी प्रकट हुए।
 
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥