श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 28

 
श्लोक
आत्यन्तिकेन सत्त्वेन दिवं देवा: प्रपेदिरे ।
धरां रज:स्वभावेन पणयो ये च ताननु ॥ २८ ॥
 
शब्दार्थ
आत्यन्तिकेन—अत्यधिक; सत्त्वेन—सतोगुण द्वारा; दिवम्—उच्चतर लोकों में; देवा:—देवता; प्रपेदिरे—स्थित है; धराम्— पृथ्वी पर; रज:—रजोगुण; स्वभावेन—स्वभाव से; पणय:—मानव; ये—वे सब; च—भी; तान्—उनके; अनु—अधीन ।.
 
अनुवाद
 
 देवतागण, अति उत्तम गुण, सतोगुण के द्वारा योग्य बनकर, स्वर्गलोक में अवस्थित रहते हैं, जबकि मनुष्य अपने रजोगुणी स्वभाव के कारण अपने अधीनस्थों की संगति में पृथ्वी पर रहते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (१४.१४-१५) में कहा गया है कि जो सतोगुण में अत्यधिक विकसित हैं, वे उच्चतर स्वर्गलोकों को जाते हैं और जो रजोगुण द्वारा अभिभूत हैं, वे मध्य लोकों में—पृथ्वी तथा ऐसे ही अन्य लोकों में—स्थित रहते हैं। किन्तु जो तमोगुण से पूरित हैं, वे निम्नलोकों में या पशु जगत में गिरा दिये जाते हैं। देवतागण सतोगुण में अतीव बढ़े-चढ़े होते हैं, अत: वे स्वर्गलोकों में स्थित रहते हैं। मनुष्यों से भी नीचे पशु हैं, यद्यपि उनमें से कुछ पशु मानव समाज से मिलते रहते हैं। गौवें, घोड़े, कुत्ते आदि मनुष्य के संरक्षण में रहने के आदी हैं।
इस श्लोक में आत्यन्तिकेन शब्द अत्यन्त सार्थक है। भौतिक प्रकृति के सतोगुण के विकास से मनुष्य स्वर्गलोक में स्थित हो सकता है। किन्तु रजो तथा तमो गुणों के अत्यधिक विकास से मनुष्य उन पशुओं की हत्या करने लगता है जिन्हें मनुष्य द्वारा संरक्षण दिया जाता है। जो व्यक्ति व्यर्थ की पशुहत्या में रत होते हैं उनमें रजो तथा तमोगुण अत्यधिक विकसित हो चुके होते हैं और सतोगुण की दिशा में उनके बढऩे की कोई आशा नहीं रहती। उनके जीवन का निम्नतर स्थितियों में अध:पतन होता ही है। उच्चतर तथा निम्नलोकों की गणना उनमें रहने वाले जीवों की श्रेणियों के अनुसार होती है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥