श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
एते वर्णा: स्वधर्मेण यजन्ति स्वगुरुं हरिम् ।
श्रद्धयात्मविशुद्ध्यर्थं यज्जाता: सह वृत्तिभि: ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
एते—ये सारे; वर्णा:—समाज की श्रेणियाँ; स्व-धर्मेण—अपने-अपने वृत्तिपरक कर्तव्यों द्वारा; यजन्ति—पूजा करते हैं; स्व- गुरुम्—अपने गुरु; हरिम्—भगवान् को; श्रद्धया—श्रद्धा तथा भक्तिपूर्वक; आत्म—आत्मा; विशुद्धि-अर्थम्—शुद्ध करने के लिए; यत्—जिससे; जाता:—उत्पन्न; सह—के साथ; वृत्तिभि:—वृत्तिपरक कर्तव्य ।.
 
अनुवाद
 
 ये भिन्न-भिन्न समस्त सामाजिक विभाग, अपने-अपने वृत्तिपरक कर्तव्यों तथा जीवन परिस्थितियों के साथ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से उत्पन्न होते हैं। इस तरह अबद्धजीवन तथा आत्म-साक्षात्कार के लिए मनुष्य को गुरु के निर्देशानुसार परम प्रभु की पूजा करनी होती है।
 
तात्पर्य
 चूँकि सारे जीव भगवान् के विराट रूप के शरीर के पृथक्-पृथक् भागों से उत्पन्न हुए हैं, अतएव सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के समस्त भागों के जीवों को परम शरीर का नित्य सेवक माना जाता है। हमारे अपने शरीर का प्रत्येक भाग, यथा मुँह, हाथ, जाँघ तथा पाँव, सम्पूर्ण शरीर की सेवा करने के लिए होते हैं। यही उनकी स्वाभाविक स्थिति है। मानवेतर जीवन में जीवों को स्वाभाविक स्थिति की चेतना नहीं होती, किन्तु मनुष्य जीवन में उनसे आशा की जाती है कि वे वर्ण प्रणाली के माध्यम से इसे जानें। जैसाकि ऊपर उल्लेख हुआ है, समाज के समस्त वर्णों का गुरु ब्राह्मण होता है, अत: ब्राह्मण संस्कृति, जिसकी पराकाष्ठा भगवान् की दिव्य सेवा है, आत्मा की शुद्धि के लिए आधार भूत सिद्धान्त है।

बद्धजीवन में आत्मा को ऐसा प्रतीत होता है कि वह ब्रह्माण्ड का स्वामी बन सकता है और इस भ्रान्त धारणा का अन्तिम बिन्दु यह है कि वह अपने को ब्रह्म सोचने लगता है। मूर्ख बद्ध-जिवात्मा इस बात पर ध्यान नहीं देता कि ब्रह्म कभी माया द्वारा बद्ध नहीं हो सकता। यदि ब्रह्म माया द्वारा बद्ध हो जाय तो फिर उसकी सर्वोच्चता कहाँ रही? उस दशा में माया सर्वोच्च होगी। इसलिए जीव कभी सर्वोच्च नहीं हो सकते, क्योंकि वे बद्ध हैं। इस श्लोक में बद्ध आत्मा की वास्तविक स्थिति बतलाई गई है—तीन गुणों में भौतिक प्रकृति से सम्पर्क के कारण सारे बद्धजीव अशुद्ध होते हैं। इसलिए ऐसे प्रामाणिक गुरु के पथ प्रदर्शन के अन्तर्गत उन्हें अपने को शुद्ध बनाना आवश्यक होता है, जो अपनी योग्यता से न केवल ब्राह्मण हों, अपितु वैष्णव भी हों। यहाँ पर आत्मशुद्धि की जिस एकमात्र विधि का उल्लेख हुआ है, वह मान्य विधि के अन्तर्गत—प्रामाणिक गुरु के पथ प्रदर्शन में—भगवान् की पूजा करना है। यही शुद्धि की स्वाभाविक विधि है और अन्य किसी विधि की प्रामाणिक होने के रूप में संस्तुति नहीं की गई है। शुद्धि की अन्य विधियाँ जीवन की इस अवस्था तक पहुँचने में सहायक बन सकती हैं, किन्तु वास्तविक सिद्धि प्राप्त करने के पूर्व मनुष्य को इस अन्तिम बिन्दु तक आना होता है। भगवद्गीता (७.१९) में इस सत्यता की पुष्टि निम्नवत् हुई है—

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।

वासुदेव: सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभ: ॥

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥