श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
तथापि कीर्तयाम्यङ्ग यथामति यथाश्रुतम् ।
कीर्तिं हरे: स्वां सत्कर्तुं गिरमन्याभिधासतीम् ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
तथा—इसलिए; अपि—यद्यपि ऐसा है; कीर्तयामि—मैं वर्णन करता हूँ; अङ्ग—हे विदुर; यथा—जिस तरह; मति—बुद्धि; यथा—जिस तरह; श्रुतम्—सुना हुआ; कीर्तिम्—यश; हरे:—भगवान् का; स्वाम्—निजी; सत्-कर्तुम्—शुद्ध करने हेतु; गिरम्—वाणी; अन्याभिधा—अन्यथा; असतीम्—अपवित्र ।.
 
अनुवाद
 
 अपनी असमर्थता के बावजूद मैं (अपने गुरु से) जो कुछ सुन सका हूँ तथा जितना आत्मसात् कर सका हूँ उसे अब शुद्ध वाणी द्वारा भगवान् की महिमा के वर्णन में लगा रहा हूँ, अन्यथा मेरी वाक्शक्ति अपवित्र बनी रहेगी।
 
तात्पर्य
 बद्ध आत्मा की शुद्धि के लिए उसकी चेतना की शुद्धि आवश्यक है। चेतना की उपस्थिति से दिव्य आत्मा की उपस्थिति की पुष्टि होती है और ज्योंही चेतना शरीर को त्याग देती है त्योंही शरीर निष्क्रिय हो जाता है। अत: चेतना की अनुभूति कार्यों से होती है। प्रत्यक्षवादी दार्शनिकों द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला यह सिद्धान्त कि चेतना निष्क्रिय अवस्था में रह सकती है उनके अल्पज्ञान का प्रमाण है। शुद्ध चेतना के कार्यकलापों को रोककर किसी को भी अपवित्र नहीं बनना चाहिए। यदि शुद्ध चेतना के कार्यकलापों को रोका जाता है, तो निश्चय ही सचेत जीवनी शक्ति अन्य प्रकार से व्यस्त हो जाएगी, क्योंकि जब तक व्यस्त न हो, चेतना का कोई अर्थ नहीं होता। चेतना क्षणभर भी शान्त नहीं रह सकती। जब शरीर कार्य नहीं करता होता है, तो चेतना स्वप्नों के रूप में कार्य करती है। अचेतनता कृत्रिम है। बाह्य प्रेरणा से यह सीमित अवधि तक रहती है, किन्तु जब दवा का नशा उतरता है या जब मनुष्य जग जाता है, तो चेतना फिर से सही ढंग से कार्य करने लगती है।

मैत्रेय का कथन है कि अपवित्र सचेतन कार्यकलापों से बचने के लिए वे भगवान् की अनन्त कीर्ति का वर्णन करने का प्रयास कर रहे थे यद्यपि उनको ठीक से वर्णित कर पाने की सामर्थ्य उनमें नहीं थी। भगवान् की कीर्ति का गायन किसी शोध का परिणाम नहीं है, अपितु गुरुमुख से विनीत भाव से सुनने का परिणाम है। अपने गुरु से जो कुछ सुना हुआ रहता है उसे पूर्ण रूप से दुहरा पाना भी सम्भव नहीं है, किन्तु भरसक प्रयास करके यथासम्भव कुछ न कुछ वर्णन किया जा सकता है। इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि भगवान् की महिमा का वर्णन पूरी तरह हुआ या नहीं। मनुष्य को मनसा वाचा-कर्मणा भगवान् की दिव्य महिमा के गायन का प्रयास करना चाहिए अन्यथा ऐसे कार्यकलाप अपवित्र तथा अशुद्ध बने रहेंगे। बद्धजीव के जीवन मन तथा वाणी को भगवान् की सेवा में लगाने की विधि से ही शुद्ध बनाया जा सकता है। वैष्णवमत का त्रिदण्डी संन्यासी तीन दण्ड धारण करता है और ये दण्ड शरीर, मन, तथा वाणी से भगवान् की सेवा में लगने के व्रत के प्रतीक हैं जबकि एकदण्डी संन्यासी ब्रह्म से एकाकार होने का व्रत लेता है। चूँकि भगवान् परम हैं, अतएव उनमें तथा उनकी महिमा में कोई अन्तर नहीं है। वैष्णव संन्यासी द्वारा गाई जाने वाली भगवान् की महिमाएं भगवान् जैसी ही सारपूर्ण हैं। अत: भगवान् की महिमा का वर्णन करते हुए भक्त दिव्य रुचि में अभिभूत हो कर उनसे एकाकार हो जाता है, यद्यपि वह शाश्वत रूप से दिव्य सेवक बना रहता है। भक्त की यह एकसाथ अचिन्त्य भेदाभेद स्थिति उसे शाश्वत रूप से शुद्ध बनाती है और इस तरह उसका जीवन पूर्णरूपेण सफल बन जाता है।

 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥