श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
प्रबुद्धकर्मा दैवेन त्रयोविंशतिको गण: ।
प्रेरितोऽजनयत्स्वाभिर्मात्राभिरधिपूरुषम् ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
प्रबुद्ध—जाग्रत; कर्मा—कार्यकलाप; दैवेन—ब्रह्म की इच्छा से; त्रय:-विंशतिक:—तेईस प्रमुख अवयवों द्वारा; गण:—संमेल; प्रेरित:—द्वारा प्रेरित; अजनयत्—प्रकट किया; स्वाभि:—अपने; मात्राभि:—स्वांश से; अधिपूरुषम्—विराट रूप (विश्वरूप) को ।.
 
अनुवाद
 
 जब परम पुरुष की इच्छा से तेईस प्रमुख तत्त्वों को सक्रिय बना दिया गया तो भगवान् का विराट विश्वरूप शरीर प्रकट हुआ।
 
तात्पर्य
 विराट् रूप या विश्व रूप जिसकी निर्विशेषवादी बहुत बड़ाई करते हैं, वह भगवान् का नित्य रुप नहीं है। यह भगवान् की परम इच्छा द्वारा भौतिक सृष्टि के अवयवों के बाद प्रकट किया जाता है। भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को यह विराट या विश्वरूप निर्विशेषवादियों को यह विश्वास दिलाने के लिए दिखलाया कि वे ही आदि भगवान् हैं। कृष्ण ने विराट् रूप प्रकट किया था। ऐसा नहीं है कि विराट रूप द्वारा कृष्ण प्रकट हुए, इसलिए विराट रूप भगवान् द्वारा वैकुण्ठ में प्रकट किया गया नित्य रूप नहीं है। यह भगवान् का भौतिक प्राकट्य है। नवजिज्ञासुओं के लिए मन्दिर का अर्चाविग्रह भगवान् का ऐसा ही प्राकट्य है। किन्तु भगवान् के विराट तथा अर्चा रूप भौतिक होने पर भी उनके नित्य रूप से अभिन्न हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥