श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक
परेण विशता स्वस्मिन्मात्रया विश्वसृग्गण: ।
चुक्षोभान्योन्यमासाद्य यस्मिन्लोकाश्चराचरा: ॥ ५ ॥
 
शब्दार्थ
परेण—भगवान् द्वारा; विशता—इस तरह प्रवेश करके; स्वस्मिन्—स्वत:; मात्रया—स्वांश द्वारा; विश्व-सृक्—विश्व सृष्टि के तत्त्व; गण:—सारे; चुक्षोभ—रूपान्तरित हो गये; अन्योन्यम्—परस्पर; आसाद्य—प्राप्त करके; यस्मिन्—जिसमें; लोका:— लोक; चर-अचरा:—जड़ तथा चेतन ।.
 
अनुवाद
 
 ज्योंही भगवान् ने अपने स्वांश रूप में विश्व के सारे तत्त्वों में प्रवेश किया, त्योंही वे विराट रूप में रूपान्तरित हो गये जिसमें सारे लोक और समस्त जड़ तथा चेतन सृष्टियाँ टिकी हुई हैं।
 
तात्पर्य
 विराट सृष्टि के सारे तत्त्व पदार्थ हैं और जब तक भगवान् अपने स्वांश रूप में उनमें प्रवेश नहीं करते तब तक आकार में वृद्धि करने की उनमें कोई सामर्थ्य नहीं होती। इसका अर्थ हुआ कि जब तक आध्यात्मिक स्पर्श नहीं होता तब तक पदार्थ घट या बढ़ नहीं सकता। पदार्थ आत्मा का प्रतिफल है और आत्मा के स्पर्श से ही बढ़ता है। इस सम्पूर्ण विराट जगत ने अपने आप यह विराट रूप धारण नहीं किया है जैसाकि अल्पज्ञों की गलत धारणा है। जब तक पदार्थ के भीतर आत्मा रहता है तब तक पदार्थ आवश्यकतानुसार बढ़ सकता है, किन्तु आत्मा के बिना पदार्थ बढऩा बन्द कर देता है। उदाहरणार्थ, जब तक जीव के शरीर
के भीतर आध्यात्मिक चेतना रहती है तब तक शरीर अपेक्षित आकार तक बढ़ता रहता है, किन्तु मृत भौतिक शरीर जिसमें आध्यात्मिक चेतना नहीं रहती, बढऩा बन्द कर देता है। भगवद्गीता में (द्वितीय अध्याय) शरीर को नहीं बल्कि आध्यात्मिक चेतना को महत्त्व प्रदान किया गया है। सम्पूर्ण विराट शरीर उसी विधि से बढ़ा जिसे हम अपने लघु शरीरों में अनुभव करते हैं। किन्तु मनुष्य को मूर्खतावश यह नहीं सोचना चाहिए कि व्यष्टि सूक्ष्म आत्मा विश्वरूप की विराट अभिव्यक्ति का कारण है। विश्वरूप को विराट रूप इसीलिए कहा जाता है, क्योंकि भगवान् अपने स्वांश रूप में इसके भीतर होते हैं।
 
 
All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥