श्रीमद् भागवतम
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 8

 
श्लोक
एष ह्यशेषसत्त्वानामात्मांश: परमात्मन: ।
आद्योऽवतारो यत्रासौ भूतग्रामो विभाव्यते ॥ ८ ॥
 
शब्दार्थ
एष:—यह; हि—निस्सन्देह; अशेष—असीम; सत्त्वानाम्—जीवों के; आत्मा—आत्मा; अंश:—अंश; परम-आत्मन:—परमात्मा का; आद्य:—प्रथम; अवतार:—अवतार; यत्र—जिसमें; असौ—वे सब; भूत-ग्राम:—समुचित सृष्टियाँ; विभाव्यते—फलती फूलती हैं ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् का विश्वरूप प्रथम अवतार तथा परमात्मा का स्वांश होता है। वे असंख्य जीवों के आत्मा हैं और उनमें समुच्चित सृष्टि (भूतग्राम) टिकी रहती है, जो इस तरह फलती फूलती है।
 
तात्पर्य
 भगवान् दो प्रकार से अपना विस्तार करते हैं—आत्म स्वांश द्वारा तथा विभक्त सूक्ष्म अंश द्वारा। आत्म स्वांश विष्णुतत्त्व है तथा विभक्त अंश जीव हैं। चूँकि जीव अत्यन्त लघु हैं, अतएव कभी- कभी उन्हें भगवान्
की तटस्था शक्ति कहा जाता है। किन्तु योगीजन जीवों तथा परमात्मा को एक ही मानते हैं, पर यह विवाद का बहुत नगण्य बिन्दु है। कुल मिलाकर प्रत्येक वस्तु भगवान् के विराट् रूप या विश्वरूप पर ही टिकी रहती है।
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All glories to saints and sages of the Supreme Lord
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥