श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 6: विश्व रूप की सृष्टि  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
साध्यात्म: साधिदैवश्च साधिभूत इति त्रिधा ।
विराट् प्राणो दशविध एकधा हृदयेन च ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
स-आध्यात्म:—शरीर तथा समस्त इन्द्रियों समेत मन; स-आधिदैव:—तथा इन्द्रियों के नियंत्रक देवता; च—तथा; स- आधिभूत:—वर्तमान विषय; इति—इस प्रकार; त्रिधा—तीन; विराट्—विराट; प्राण:—चालक शक्ति; दश-विध:—दस प्रकार; एकधा—केवल एक; हृदयेन—चेतना शक्ति; च—भी ।.
 
अनुवाद
 
 विश्वरूप तीन, दस तथा एक के द्वारा इस अर्थ में प्रस्तुत होता है कि वे (भगवान्) शरीर तथा मन और इन्द्रियाँ हैं। वे ही दस प्रकार की जीवन शक्ति द्वारा समस्त गतियों की गत्यात्मक शक्ति हैं और वे ही एक हृदय हैं जहाँ जीवन-शक्ति सृजित होती है।
 
तात्पर्य
 भगवद्गीता (७.४-५) में कहा गया है कि आठ तत्त्व—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार—भगवान् की कनिष्ठा शक्ति के उत्पाद हैं जबकि कनिष्ठा शक्ति का उपभोग करते दिखाई पडऩे वाले जीव मूलत: श्रेष्ठ शक्ति से अर्थात् भगवान् की अन्तरंगा शक्ति से—सम्बन्धित हैं। आठों कनिष्ठा शक्तियाँ स्थूल तथा सूक्ष्म रीति से कार्य करती हैं जबकि श्रेष्ठ शक्ति मध्यवर्ती केन्द्रीय जनक शक्ति के रूप में कार्य करती है—ऐसा मानव शरीर में अनुभव किया जाता है। स्थूल तत्त्व—पृथ्वी आदि—बाह्य स्थूल शरीर का निर्माण करते हैं और ऊपरी वस्त्र (कुर्ते) के सदृश हैं जबकि सूक्ष्म मन तथा मिथ्या अहंकार शरीर के भीतरी वस्त्र (बनियान) की तरह कार्य करते हैं।

शरीर की गतियाँ सर्वप्रथम हृदय से उत्पन्न होती है और शरीर के सारे कार्यकलाप इन्द्रियों द्वारा सम्भव होते हैं, जो शरीर के भीतर दस प्रकार की वायु द्वारा शक्ति प्राप्त करती हैं। दस प्रकार की वायु का वर्णन इस प्रकार है—श्वास लेते समय नाक से प्रविष्ट होने वाली मुख्य वायु प्राण कहलाती है। जो वायु गुदा से बाहर निकलती है, वह अपान कहलाती है। जो वायु उदर के भीतर भोजन को ठीक करती है और जो कभी-कभी डकार के रूप में निकलती है, समान कहलाती है। जो वायु गले से होकर जाती है और जिसके रुकने से दम घुटता है, वह उदान वायु कहलाती है। जो सम्पूर्ण वायु पूरे शरीर में चक्कर लगाती है, वह व्यान वायु कहलाती है। इन पाँचों वायुओं से भी सूक्ष्म अन्य वायु हैं। जो वायु आँखों के और मुख के खुलने में सहायक बनती है, वह नाग वायु कहलाती है। जो वायु भूख को बढ़ाती है, कृकर वायु कहलाती है। जो वायु संकुचन में सहायक होती है, वह कूर्म वायु कहलाती है। जो वायु अँगड़ाई लेते समय मुख को फैलाकर विश्राम दिलाती है, वह देवदत्त कहलाती है तथा जो वायु संपोषण में सहायक बनती है, वह धनञ्जय वायु कहलाती है।

ये सारी वायु हृदय के मध्य से उत्पन्न होती हैं और हृदय केवल एक है। यह मध्यवर्ती शक्ति भगवान् की श्रेष्ठ शक्ति है, जो हृदय के भीतर शरीर के आत्मा के साथ आसीन है, जो भगवान् के मार्गदर्शन में कार्य करता है। इसकी व्याख्या भगवद्गीता (१५.१५) में इस प्रकार हुई है— सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद् वेदविदेव चाहम् ॥

संपूर्ण मध्यवर्ती शक्ति भगवान् द्वारा हृदय से उत्पन्न की जाती है। जो वहीं पर स्थित होते हैं और स्मरण करने तथा विस्मरण करने में बद्धजीव की सहायता करते हैं। यह बद्ध अवस्था जीव द्वारा भगवान् की अधीनता की विस्मृति के कारण है। जो व्यक्ति भगवान् को भुलाए रखना चाहता है उसकी भगवान् जन्म-जन्मांतर भुलवाये रखने में सहायता करते हैं, किन्तु जो व्यक्ति भगवद्भक्त की संगति के बल पर उनका स्मरण करता है, स्मरण करने में भगवान् उसकी अधिकाधिक सहायता करते हैं। इस तरह बद्धात्मा अन्ततोगत्वा भगवद्धाम वापस जा सकता है।

भगवान् द्वारा दी जाने वाली इस दिव्य सहायता की विधि का वर्णन भगवद्गीता (१०.१०) में इस प्रकार हुआ है—

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्।

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥

मन से परे बुद्धि अर्थात् भक्ति द्वारा आत्म-साक्षात्कार की बुद्धियोग विधि अकेले ही मनुष्य को विराट सृष्टि में भव-बन्धन की बद्ध अवस्था से ऊपर ले जा सकती है। जीव की बद्ध अवस्था उस व्यक्ति जैसी है, जो किसी विशाल यांत्रिक व्यवस्था की गहराई में हो। मानसिक चिन्तक अनेकानेक जन्मों के चिन्तन के बाद ही बुद्धियोग के बिन्दु तक पहुँच सकते हैं, किन्तु बुद्धिमान व्यक्ति, जो मन के ऊपर बुद्धिस्तर से प्रारम्भ करता है, आत्म-साक्षात्कार में तीव्र प्रगति करता है। चूँकि बुद्धियोग में किसी समय भी ह्रास या पीछे जाने का किसी प्रकार से भय नहीं रहता, अतएव आत्म-साक्षात्कार के लिए यह विश्वसनीय मार्ग है, जिसकी पुष्टि भगवद्गीता द्वारा (२.४०) होती है। मानसिक चिन्तक एक ही वृक्ष पर बैठे दो पक्षियों को (श्वेताश्वतर-उपनिषद्) आत्मा तथा परमात्मा के रूप में नहीं समझ पाते। व्यष्टि आत्मा तो वृक्ष का फल खाता है, किन्तु दूसरा पक्षी फल न खाकर फल खा रहे पक्षी के कार्यकलापों का अवलोकन करता रहता है। यह साक्षी पक्षी, फल खा रहे पक्षी को सकाम कर्म करते रहने में पहुँचाता है। जो व्यक्ति आत्मा तथा परमात्मा या ईश्वर और जीव के इस अन्तर को नहीं समझ सकता वह अब भी विराट यंत्र के पाश में है, अतएव उसे उस समय की प्रतीक्षा करनी होगी जब वह इस बन्धन से छूट सकेगा।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥