श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक
यदर्थेन विनामुष्य पुंस आत्मविपर्यय: ।
प्रतीयत उपद्रष्टु: स्वशिरश्छेदनादिक: ॥ १० ॥
 
शब्दार्थ
यत्—इस प्रकार; अर्थेन—अभिप्राय या अर्थ; विना—बिना; अमुष्य—ऐसे; पुंस:—जीव का; आत्म-विपर्यय:—आत्म-पहचान के विषय में विभ्रमित; प्रतीयते—ऐसा लगता है; उपद्रष्टु:—उथले द्रष्टा का; स्व-शिर:—अपना सिर; छेदन-आदिक:—काट लेना ।.
 
अनुवाद
 
 जीव अपनी आत्म-पहचान के विषय में संकट में रहता है। उसके पास वास्तविक पृष्ठभूमि नहीं होती, ठीक उसी तरह जैसे स्वप्न देखने वाला व्यक्ति यह देखे कि उसका सिर काट लिया गया है।
 
तात्पर्य
 एक बार पाठशाला में एक शिक्षक ने अपने शिष्य को धमकाया कि वह उसका सिर काट कर दीवाल पर टाँग देगा जिससे बालक यह देख सके कि उसका सिर किस तरह काट लिया गया है। वह बालक डर गया और उसने शैतानी करनी बन्द कर दी। इसी तरह शुद्ध आत्मा के कष्ट तथा उसकी आत्म-पहचान का व्यवधान भगवान् की बहिरंगा शक्ति द्वारा ही नियंत्रित होते हैं। यह शक्ति उन शैतान जीवों को नियंत्रित करती है, जो भगवान् की इच्छा के विरुद्ध जाना चाहते हैं। वस्तुत: जीव के लिए न तो कोई बन्धन है, न कष्ट, न ही वह कभी अपनी शुद्ध चेतना गँवाता है। अपनी शुद्ध चेतना में जब भी वह अपनी स्थिति के विषय में कुछ गम्भीरता से सोचता है, तो उसकी समझ में आ सकता है कि वह सदैव परमेश्वर की कृपा पर आश्रित है और परमेश्वर से एकाकार होने का उसका प्रयास मिथ्या मोह है। जीव जन्म-जन्मांतर में भौतिक प्रकृति पर मिथ्या ही प्रभुत्व जताने का और भौतिक जगत का प्रभु बनने का प्रयास करता है। उसे कोई ठोस फल हाथ नहीं लगता। अन्त में जब वह हताश हो जाता है, तो वह अपने भौतिक कार्यकलापों को त्याग देता है और भगवान् से एकाकार होने का तथा वाग्जाल द्वारा चिन्तन करने का प्रयास करता है, किन्तु इसमें भी उसे सफलता नहीं मिलती।

ये सारे कार्य माया-शक्ति के आदेशानुसार सम्पन्न किये जाते हैं। इस अनुभव की तुलना स्वप्न में किसी मनुष्य द्वारा अपना सिर काटे जाने के अनुभव से की गई है। जिस व्यक्ति का सिर काटा जाता है, वह भी देखता है कि उसका सिर काट लिया गया है। यदि किसी मनुष्य का सिर काट लिया जाय तो वह देखने की शक्ति खो देता है। अतएव यदि कोई मनुष्य यह देखता है कि उसका सिर काट लिया गया तो इसका अर्थ यह हुआ कि उसने उसी तरह सोचा है जैसाकि व्यामोह में। इसी तरह शाश्वत रूप से जीव परमेश्वर के अधीन होता है और यह ज्ञान उसके पास रहता है, किन्तु वह कृत्रिम रुप से सोचता है कि वह स्वयं ईश्वर है और यद्यपि वह ईश्वर है, तथापि माया के कारण वह अपना ज्ञान खो चुका है। इस विचारधारा का कोई अर्थ नहीं है, जिस तरह अपने सिर को कटता हुआ देखने का कोई अर्थ नहीं हैं। यही प्रक्रिया है, जिस से ज्ञान ढका रहता है। चूँकि जीव की यह कृत्रिम विद्रोही दशा उसे सारे कष्ट प्रदान करती है, अत: यह समझना चाहिए कि उसे भगवद्भक्त के रूप में अपना सामान्य जीवन ग्रहण करना है और ईश्वर होने की भ्रान्त धारणा से मुक्त होना है। अपने को ईश्वर सोचने की तथाकथित मुक्ति अविद्या का अन्तिम प्रतिफल है, जिससे जीव पाश में बँधता है। निष्कर्ष यह है कि भगवान् की नित्य दिव्य सेवा से वंचित जीव कई प्रकार से मोहग्रस्त होता है। अपने बद्धजीवन तक में वह भगवान् का नित्य दास रहता है। मोहिनी माया के पाश के अन्तर्गत उसकी दासता भी उसकी नित्य सेवा-दशा की अभिव्यक्ति है। चूँकि उसने भगवान् की सेवा के विरुद्ध विद्रोह किया है, इसीलिए उसे माया की सेवा में रखा जाता है। वह तब भी सेवा करता है, किन्तु विकृत रीति से। जब वह भौतिक बन्धन के अन्तर्गत सेवा से बाहर होना चाहता है, तो उसके बाद वह भगवान् से एकाकार होना चाहता है। यह दूसरा मोह है। इसलिए सबसे अच्छा मार्ग भगवान् की शरण ग्रहण करना है और इस तरह हमेशा के लिए माया से छुटकारा पाना है, जिसकी पुष्टि भगवद्गीता (७.१४) में हुई है— दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।

मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतांतरन्ति ते ॥

 
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