श्रीमद् भागवतम
 
हिंदी में पढ़े और सुनें
भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक
यश्च मूढतमो लोके यश्च बुद्धे: परं गत: ।
तावुभौ सुखमेधेते क्लिश्यत्यन्तरितो जन: ॥ १७ ॥
 
शब्दार्थ
य:—जो; च—भी; मूढ-तम:—निकृष्टतम मूर्ख; लोके—संसार में; य: च—तथा जो; बुद्धे:—बुद्धि का; परम्—दिव्य; गत:—गया हुआ; तौ—उन; उभौ—दोनों; सुखम्—सुख; एधेते—भोगते हैं; क्लिश्यति—कष्ट पाते हैं; अन्तरित:—बीच में स्थित; जन:—लोग ।.
 
अनुवाद
 
 निकृष्टतम मूर्ख तथा समस्त बुद्धि के परे रहने वाले दोनों ही सुख भोगते हैं, जबकि उनके बीच के व्यक्ति भौतिक क्लेश पाते हैं।
 
तात्पर्य
 निकृष्टतम मूर्ख भौतिक क्लेशों को नहीं समझते। वे हँसी-खुशी के साथ अपना जीवन बिताते हैं और जीवन के क्लेशों के विषय में जिज्ञासा नहीं करते। ऐसे लोग लगभग पशुओं के स्तर पर होते हैं, जो भौतिक क्लेशों से अवगत नहीं रहते, यद्यपि श्रेष्ठजनों की नजरों में वे सदैव दुखी रहते हैं। शूकर का जीवन सुख के मानदण्ड के अनुसार गिरा हुआ है, क्योंकि इसमें गन्दे स्थान में रहना, किसी भी क्षण संभोग में रत रहना और जीवन-संघर्ष के लिए कठिन श्रम करना होता है, किन्तु शूकर को यह ज्ञात नहीं है। इसी तरह जो मनुष्य भौतिक जगत के कष्ट से अवगत नहीं होते तथा यौन जीवन और कठिन श्रम में सुखी रहते हैं, वे निकृष्टतम मूर्ख हैं। फिर भी चूँकि उन्हें कष्टों का कोई ज्ञान नहीं होता है वे तथाकथित सुख को भोगते प्रतीत होते हैं। अन्य श्रेणी के लोग, जो कि मुक्त हैं तथा बुद्धि से ऊपर दिव्य पद पर स्थित हैं वास्तव में सुखी हैं और परमहंस कहलाते हैं। किन्तु वे लोग, जो न तो कूकरों- सूकरों की तरह हैं और न ही परमहंस के स्तर पर हैं भौतिक क्लेशों का अनुभव करते हैं और उनके लिए परम सत्य विषयक जिज्ञासा आवश्यक है। वेदान्त सूत्र का कथन है—अथातो ब्रह्मजिज्ञासा—अब मनुष्य को ब्रह्म के विषय में जिज्ञासा करनी चाहिए। यह जिज्ञासा उन लोगों के लिए आवश्यक है, जो परमहंसों तथा उन मूर्खों के बीच के हैं जिन्होंने इन्द्रियतृप्ति वाले जीवन के बीच में आत्म-साक्षात्कार के प्रश्न को भुला दिया है।
 
शेयर करें
       
 
  All glories to Srila Prabhupada. All glories to वैष्णव भक्त-वृंद
  Disclaimer: copyrights reserved to BBT India and BBT Intl.

 
About Us | Terms & Conditions
Privacy Policy | Refund Policy
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥