श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक
अर्थाभावं विनिश्चित्य प्रतीतस्यापि नात्मन: ।
तां चापि युष्मच्चरणसेवयाहं पराणुदे ॥ १८ ॥
 
शब्दार्थ
अर्थ-अभावम्—बिना सार के; विनिश्चित्य—सुनिश्चित करके; प्रतीतस्य—बाह्य मूल्यों का; अपि—भी; न—कभी नहीं; आत्मन:—आत्मा का; ताम्—उसे; च—भी; अपि—इस तरह; युष्मत्—तुम्हारे; चरण—पाँव की; सेवया—सेवाद्वारा; अहम्— मैं; पराणुदे—त्याग सकूँगा ।.
 
अनुवाद
 
 किन्तु हे महोदय, मैं आपका कृतज्ञ हूँ, क्योंकि अब मैं समझ सकता हूँ कि यह भौतिक जगत साररहित है यद्यपि यह वास्तविक प्रतीत होता है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आपके चरणों की सेवा करने से मेरे लिए इस मिथ्या विचार को त्याग सकना सम्भव हो सकेगा।
 
तात्पर्य
 बद्धजीव के कष्ट सतही होते हैं और उनका कोई वास्तविक महत्त्व नहीं होता जिस तरह स्वप्न में किसी के सिर को काटने का कोई महत्त्व नहीं होता। यद्यपि यह कथन सिद्धान्त रूप में अतिसत्य है फिर भी सामान्य व्यक्ति या आध्यात्मिक पथ के नवजिज्ञासु के लिए इसकी अनुभूति कर पाना अतीव कठिन है। किन्तु मैत्रेय मुनि जैसे महान् ब्रह्मवादियों के चरणों की सेवा करने से तथा उनकी निरन्तर संगति करने से मनुष्य इस मिथ्या विचार को त्याग सकता है कि आत्मा को भौतिक क्लेश भोगना पड़ता है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥