श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक
यत्सेवया भगवत: कूटस्थस्य मधुद्विष: ।
रतिरासो भवेत्तीव्र: पादयोर्व्यसनार्दन: ॥ १९ ॥
 
शब्दार्थ
यत्—जिसको; सेवया—सेवा द्वारा; भगवत:—भगवान् का; कूट-स्थस्य—अपरिवर्तनीय का; मधु-द्विष:—मधु असुर का शत्रु; रति-रास:—विभिन्न सम्बन्धों में अनुरक्ति; भवेत्—उत्पन्न होती है; तीव्र:—अत्यन्त भावपूर्ण; पादयो:—चरणों की; व्यसन— क्लेश; अर्दन:—नष्ट करनेवाले ।.
 
अनुवाद
 
 गुरु के चरणों की सेवा करने से मनुष्य उन भगवान् की सेवा में दिव्य भावानुभूति उत्पन्न करने में समर्थ होता है, जो मधु असुर के कूटस्थ शत्रु हैं और जिनकी सेवा से मनुष्य के भौतिक क्लेश दूर हो जाते हैं।
 
तात्पर्य
 मैत्रेय मुनि जैसे प्रामाणिक गुरु की संगति भगवान् की प्रत्यक्ष सेवा के लिए दिव्य आसक्ति प्राप्त करने में परम सहायक हो सकती है। भगवान् मधु असुर के शत्रु हैं, अर्थात् दूसरे शब्दों में अपने शुद्ध भक्त के कष्टों के शत्रु हैं। इस श्लोक में रति रास: शब्द महत्त्वपूर्ण है। भगवान् की सेवा विभिन्न दिव्य रसों (सम्बन्धों) शान्त, वीर, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य में की जाती है। भगवान् की दिव्य सेवा के मुक्त पद पर स्थित जीव उपर्युक्त रसों में से किसी एक रस के प्रति आकृष्ट होता है और जब यह भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में लग जाता है, तो भौतिक जगत से उसकी अनुरक्ति स्वत: समाप्त हो जाती है। जैसाकि भगवद्गीता (२.५९) में कहा गया है—रसवर्जं रसोप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥