श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक
यमाहुराद्यं पुरुषं सहस्राङ्‌घ्र्‌यूरुबाहुकम् ।
यत्र विश्व इमे लोका: सविकाशं त आसते ॥ २२ ॥
 
शब्दार्थ
यम्—जो; आहु:—कहलाता है; आद्यम्—आदि; पुरुषम्—विराट जगत का अवतार; सहस्र—हजार; अङ्घ्रि—पाँव; ऊरु— जंघाएँ; बाहुकम्—हाथ; यत्र—जिसमें; विश्व:—ब्रह्माण्ड; इमे—ये सब; लोका:—लोक; स-विकाशम्—अपने-अपने विकासों के साथ; ते—वे सब; आसते—रह रहे हैं ।.
 
अनुवाद
 
 कारणार्णव में शयन करता पुरुष अवतार भौतिक सृष्टियों में आदि पुरुष कहलाता है और उनके विराट रूप में जिसमें सारे लोक तथा उनके निवासी रहते हैं, उस पुरुष के कई-कई हजार हाथ-पाँव होते हैं।
 
तात्पर्य
 प्रथम पुरुष कारणोदकशायी विष्णु हैं, द्वितीय पुरुष गर्भोदकशायी विष्णु तथा तृतीय पुरुष क्षीरोदकशायी विष्णु हैं जिनमें विराट पुरुष की कल्पना की जाती है, जिसमें सारे लोक अपने विभिन्न विस्तीर्णताओं तथा निवासियों समेत तैरते रहते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥