श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक
क्रीडायामुद्यमोऽर्भस्य कामश्चिक्रीडिषान्यत: ।
स्वतस्तृप्तस्य च कथं निवृत्तस्य सदान्यत: ॥ ३ ॥
 
शब्दार्थ
क्रीडायाम्—खेलने के मामले में; उद्यम:—उत्साह; अर्भस्य—बालकों का; काम:—इच्छा; चिक्रीडिषा—खेलने के लिए इच्छा; अन्यत:—अन्य बालकों के साथ; स्वत:-तृप्तस्य—जो आत्मतुष्ट है उसके लिए; च—भी; कथम्—किस लिए; निवृत्तस्य— विरक्त; सदा—सदैव; अन्यत:—अन्यथा ।.
 
अनुवाद
 
 बालक अन्य बालकों के साथ या विविध क्रीड़ाओं में खेलने के लिए उत्सुक रहते हैं, क्योंकि वे इच्छा द्वारा प्रोत्साहित किये जाते हैं। किन्तु भगवान् में ऐसी इच्छा की कोई सम्भावना नहीं होती, क्योंकि वे आत्म-तुष्ट हैं और सदैव हर वस्तु से विरक्त रहते हैं।
 
तात्पर्य
 चूँकि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अद्वय हैं, अत: इसकी सम्भावना नहीं है कि उनके अतिरिक्त और किसी वस्तु का अस्तित्व हो सकता हो। वे अपनी शक्तियों द्वारा स्वांशों तथा विभक्तांशों के विविध रूपों में अपना विस्तार करते हैं जिस तरह अग्नि उष्मा तथा प्रकाश द्वारा अपना विस्तार करती है। चूँकि स्वयं भगवान् के अतिरिक्त कोई अन्य अस्तित्व नहीं है, अत: किसी भी वस्तु के साथ भगवान् का साहचर्य अपने ही साथ साहचर्य को प्रकट करता है। भगवद्गीता (९.४) में भगवान् कहते हैं—

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित: ॥

“विराट स्थिति की पूर्ण अभिव्यक्ति भगवान् के निर्गुण रूप का ही विस्तार है। सारी वस्तुएँ केवल उन्हीं में स्थित हैं, फिर भी वे उनमें नहीं हैं।” यह भगवान् की आसक्ति तथा विरक्ति का ऐश्वर्य है। वे हर वस्तु के प्रति आसक्त हैं फिर भी सबों से विरक्त हैं।

 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥