श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक
यज्ञस्य च वितानानि योगस्य च पथ: प्रभो ।
नैष्कर्म्यस्य च सांख्यस्य तन्त्रं वा भगवत्स्मृतम् ॥ ३० ॥
 
शब्दार्थ
यज्ञस्य—यज्ञों का; च—भी; वितानानि—विस्तार; योगस्य—योग शक्ति का; च—भी; पथ:—मार्ग; प्रभो—हे प्रभु; नैष्कर्म्यस्य—ज्ञान का; च—तथा; साङ्ख्यस्य—वैश्लेषिक अध्ययन का; तन्त्रम्—भक्ति का मार्ग; वा—तथा; भगवत्— भगवान् के सम्बन्ध में; स्मृतम्—विधि-विधान ।.
 
अनुवाद
 
 कृपया विभिन्न यज्ञों के विस्तारों तथा योग शक्तियों के मार्गों, ज्ञान के वैश्लेषिक अध्ययन (सांख्य) तथा भक्ति-मय सेवा का उनके विधि-विधानों सहित वर्णन करें।
 
तात्पर्य
 यहाँ पर तन्त्रम् शब्द महत्त्वपूर्ण है। कभी-कभी तन्त्रम् को भ्रान्तिवश इन्द्रियतृप्ति में लगे भौतिकतावादी व्यक्तियों का काला जादू समझ लिया जाता है, किन्तु यहाँ पर तन्त्रम् का अर्थ भक्ति का विज्ञान है, जिसका संग्रह श्रील नारद मुनि ने किया। मनुष्य भक्तिमार्ग की ऐसी विधिमयी व्याख्याओं का लाभ उठाकर भगवद्भक्ति में प्रगति कर सकता है। सांख्य दर्शन ज्ञान प्राप्ति का मूल सिद्धान्त है जैसाकि मैत्रेय मुनि द्वारा बतलाया जाएगा। देवहूति-पुत्र कपिलदेव द्वारा प्रवर्तित सांख्य दर्शन परब्रह्म के विषय में ज्ञान का असली स्रोत है। जो ज्ञान सांख्य दर्शन पर आधारित नहीं है, वह मानसिक चिन्तन है और उससे कोई वास्तविक लाभ नहीं प्राप्त हो सकता।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥