श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक
पाषण्डपथवैषम्यं प्रतिलोमनिवेशनम् ।
जीवस्य गतयो याश्च यावतीर्गुणकर्मजा: ॥ ३१ ॥
 
शब्दार्थ
पाषण्ड-पथ—अश्रद्धा का मार्ग; वैषम्यम्—विरोध के द्वारा अपूर्णता; प्रतिलोम—वर्णसंकर; निवेशनम्—स्थिति; जीवस्य— जीवों की; गतय:—गतिविधियाँ; या:—वे जैसी हैं; च—भी; यावती:—जितनी; गुण—भौतिक प्रकृति के गुण; कर्म-जा:— विभिन्न प्रकार के कर्म से उत्पन्न ।.
 
अनुवाद
 
 कृपया श्रद्धाविहीन नास्तिकों की अपूर्णताओं तथा विरोधों का, वर्णसंकरों की स्थिति तथा विभिन्न जीवों के प्राकृतिक गुणों तथा कर्म के अनुसार विभिन्न जीव-योनियों की गतिविधियों का भी वर्णन करें।
 
तात्पर्य
 प्रकृति के विभिन्न गुणों वाले जीवों के संयोग को वर्णसंकर या प्रतिलोम कहा जाता है। श्रद्धाविहीन नास्तिक लोग ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते, अतएव उनके दर्शन के मार्ग परस्पर विरोधी होते हैं। नास्तिकतावादी दर्शन कभी भी एक दूसरे से मेल नहीं खाते। जीव की विभिन्न योनियाँ प्रकृति के गुणों के मिश्रण की विविधता के प्रमाण हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥