श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक
श्राद्धस्य च विधिं ब्रह्मन् पितृणां सर्गमेव च ।
ग्रहनक्षत्रताराणां कालावयवसंस्थितिम् ॥ ३३ ॥
 
शब्दार्थ
श्राद्धस्य—समय-समय पर सम्मानसूचक भेंटों का; च—भी; विधिम्—नियम; ब्रह्मन्—हे ब्राह्मण; पितृणाम्—पूर्वजों की; सर्गम्—सृष्टि; एव—जिस तरह; च—भी; ग्रह—ग्रह प्रणाली; नक्षत्र—तारे; ताराणाम्—ज्योतिपिण्डों; काल—समय; अवयव—अवधि; संस्थितिम्—स्थितियाँ ।.
 
अनुवाद
 
 कृपा करके पूर्वजों के श्राद्ध के विधि-विधानों, पितृलोक की सृष्टि, ग्रहों, नक्षत्रों तथा तारकों के काल-विधान तथा उनकी अपनी-अपनी स्थितियों के विषय में भी बतलाएँ।
 
तात्पर्य
 दिन-रात तथा मास-वर्ष की अवधियाँ विभिन्न ग्रहों, नक्षत्रों तथा तारकों में भिन्न-भिन्न हैं। चन्द्रमा तथा शुक्र जैसे उच्चतरग्रहों में काल की प्रमाप पृथ्वी की अपेक्षा भिन्न है। कहा जाता है कि इस पृथ्वी ग्रह के छह मास उच्चतर ग्रहों के एक दिन के तुल्य हैं। भगवद्गीता में ब्रह्मलोक का एक दिन चतुर्युगों से एक हजार गुना वर्षों के तुल्य है अर्थात् ४,३००,००० वर्षों का एक हजार गुना वर्ष। ब्रह्मलोक में मास तथा दिन उसी के अनुसार परिमाणित होते हैं।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥