श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक
दानस्य तपसो वापि यच्चेष्टापूर्तयो: फलम् ।
प्रवासस्थस्य यो धर्मो यश्च पुंस उतापदि ॥ ३४ ॥
 
शब्दार्थ
दानस्य—दान का; तपस:—तपस्या का; वापि—बावड़ी; यत्—जो; च—तथा; इष्टा—प्रयास; पूर्तयो:—जलाशयों का; फलम्—सकाम फल; प्रवास-स्थस्य—घर से दूर रहने वाले का; य:—जो; धर्म:—कर्तव्य; य: च—और जो; पुंस:—मनुष्य का; उत—वर्णित; आपदि—आपत्ति में ।.
 
अनुवाद
 
 कृपया दान तथा तपस्या का एवं जलाशय खुदवाने के सकाम फलों का भी वर्णन करें। कृपया घर से दूर रहने वालों की स्थिति का तथा आपदग्रस्त मनुष्य के कर्तव्य का भी वर्णन करें।
 
तात्पर्य
 जनता के उपयोग हेतु जलाशय खुदवाना महत् दान कार्य है और पचास वर्ष की आयु के बाद गृहस्थ जीवन से वैराग्य लेना भद्र मनुष्य द्वारा सम्पन्न महान् तपस्या का कार्य है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥