श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक
येन वा भगवांस्तुष्येद्धर्मयोनिर्जनार्दन: ।
सम्प्रसीदति वा येषामेतदाख्याहि मेऽनघ ॥ ३५ ॥
 
शब्दार्थ
येन—जिससे; वा—अथवा; भगवान्—भगवान्; तुष्येत्—तुष्ट होता है; धर्म-योनि:—समस्त धर्मों का पिता; जनार्दन:—सारे जीवों का नियन्ता; सम्प्रसीदति—पूर्णतया तुष्ट होता है; वा—अथवा; येषाम्—जिनका; एतत्—ये सभी; आख्याहि—कृपया वर्णन करें; मे—मुझसे; अनघ—हे निष्पाप पुरुष ।.
 
अनुवाद
 
 हे निष्पाप पुरुष, चूँकि समस्त जीवों के नियन्ता भगवान् समस्त धर्मों के तथा धार्मिक कर्म करने वाले समस्त लोगों के पिता हैं, अतएव कृपा करके इसका वर्णन कीजिये कि उन्हें किस प्रकार पूरी तरह से तुष्ट किया जा सकता है।
 
तात्पर्य
 समस्त धार्मिक कार्यकलाप अन्ततोगत्वा परमेश्वर को तुष्ट करने के लिए हैं। भगवान् समस्त धर्मों के पिता हैं। जैसाकि भगवद्गीता (७.१६) में कहा गया है, चार प्रकार के पवित्र पुरुष— अर्थार्थी, आर्त, प्रबुद्ध (ज्ञानी) तथा जिज्ञासु भक्ति द्वारा भगवान् के पास पहुँचते हैं और इनकी भक्ति भौतिक स्नेह से मिश्रित होती है। किन्तु इन सबों के ऊपर वे शुद्ध भक्त हैं, जिनकी भक्ति सकाम कर्म या चिन्तनशील ज्ञान के किसी भौतिक कलुष से रंजित नहीं है। जो लोग जीवन भर केवल दुष्ट बने रहते हैं उनके जीवन की तुलना असुरों से की गई है। (भगवद्गीता ७.१५) चाहे वे कैसा भी शैक्षिक जीवन क्यों न बिताएँ, वे समस्त ज्ञान से वंचित ही रहते हैं। ऐसे लुच्चे कभी भी भगवान् को तुष्ट करने वाले व्यक्ति नहीं होते।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥