श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 36
 
 
श्लोक
अनुव्रतानां शिष्याणां पुत्राणां च द्विजोत्तम ।
अनापृष्टमपि ब्रूयुर्गुरवो दीनवत्सला: ॥ ३६ ॥
 
शब्दार्थ
अनुव्रतानाम्—अनुयायियों के; शिष्याणाम्—शिष्यों के; पुत्राणाम्—पुत्रों के; च—भी; द्विज-उत्तम—हे ब्राह्मणश्रेष्ठ; अनापृष्टम्—अनपूछा; अपि—भी; ब्रूयु:—कृपया वर्णन करें; गुरव:—गुरुजन; दीन-वत्सला:—दीनों के प्रति कृपालु ।.
 
अनुवाद
 
 हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, जो गुरुजन हैं, वे दीनों पर अत्यन्त कृपालु रहते हैं। वे अपने अनुयायियों, शिष्यों तथा पुत्रों के प्रति सदैव कृपालु होते हैं और उनके द्वारा बिना पूछे ही सारा ज्ञान प्रदान करते हैं।
 
तात्पर्य
 प्रामाणिक गुरु से जानने योग्य अनेक विषय होते हैं। प्रामाणिक गुरु के लिए अनुयायी, शिष्य तथा पुत्र सभी एकसमान होते हैं और वह उन पर सदैव कृपालु रहता है तथा उनके न पूछने पर भी वह सदैव उन्हें दिव्य विषयों के बारे में बताता रहता है। यही प्रामाणिक गुरु का स्वभाव है। विदुर ने मैत्रेय मुनि से ऐसे विषयों के बारे में भी बताने के लिए अनुरोध किया जिन्हें उन्होंने उनसे न भी पूछा हो।
 
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  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥