श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 37
 
 
श्लोक
तत्त्वानां भगवंस्तेषां कतिधा प्रतिसंक्रम: ।
तत्रेमं क उपासीरन् क उ स्विदनुशेरते ॥ ३७ ॥
 
शब्दार्थ
तत्त्वानाम्—प्रकृति के तत्त्वों का; भगवन्—हे महर्षि; तेषाम्—उनके; कतिधा—कितने; प्रतिसङ्क्रम:—प्रलय; तत्र—वहाँ; इमम्—भगवान् को; के—वे कौन हैं; उपासीरन्—बचाया जाकर; के—वे कौन हैं; उ—जो; स्वित्—कर सकती है; अनुशेरते—भगवान् के शयन करते समय सेवा ।.
 
अनुवाद
 
 कृपया इसका वर्णन करें कि भौतिक प्रकृति के तत्त्वों का कितनी बार प्रलय होता है और इन प्रलयों के बाद जब भगवान् सोये रहते हैं उन की सेवा करने के लिए कौन जीवित रहता है?
 
तात्पर्य
 ब्रह्म-संहिता (५.४७-४८) में कहा गया है कि जब महाविष्णु योगनिद्रा में रहते हैं, तो उनके श्वास लेते समय असंख्य ब्रह्माण्डों समेत सारे भौतिक जगत प्रकट तथा अप्रकट होते रहते हैं। य: कारणार्णवजले भजति स्म योग- निद्रामनन्तजगदण्डसरोमकूप: ।

आधारशक्तिमवलम्ब्य परां स्वमूर्तिं गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

यस्यैकनिश्वसितकालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथा: ॥

विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥

“गोविन्द जो कि सर्वोच्च तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् (कृष्ण) हैं अपनी उस निद्रा के समय असंख्य ब्रह्माण्डों की सृष्टि करने के लिए कारणार्णव में अनन्तकाल तक सोते रहते हैं। वे अपनी अन्तरंगा शक्ति द्वारा जल में लेटे रहते हैं। मैं उन आदि भगवान् की पूजा करता हूँ।”

“उनके श्वास लेने से असंख्य ब्रह्माण्डों का जन्म होता है और जब वे श्वास निकालते हैं, तो समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामियों का संहार हो जाता है। भगवान् का वह स्वांश महाविष्णु कहलाता है और वे भगवान् कृष्ण के अंश के अंश होते हैं। मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ।”

भौतिक जगतों के प्रलय के पश्चात्, न तो भगवान् का, न कारणार्णव के परे उनके राज्य का विलय होता है, न ही वहाँ के निवासी भगवान् के संगियों का। भगवान् के संगियों की संख्या उन जीवों से काफी अधिक है जिन्होंने भौतिक संगति के कारण भगवान् को भुला दिया है। मूल भागवत के अहमेवासमेवाग्रे इत्यादि चार श्लोकों में आये अहम् शब्द की निर्विशेषवादियों द्वारा की जाने वाली व्याख्या का यहाँ खण्डन किया गया है। भगवान् तथा उनके नित्य संगी प्रलय के बाद बचे रहते हैं। विदुर द्वारा ऐसे व्यक्तियों के विषय में प्रश्न किया जाना भगवान् के समस्त साज-सामान के अस्तित्व का स्पष्ट सूचक है। इसकी पुष्टि काशीखंड में हुई है, जिसका उद्धरण श्रील जीव गोस्वामी तथा श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती दोनों ने श्रील श्रीधर स्वामी का अनुसरण करते हुए दिया है।

न च्यवन्ते हि यद्भक्ता महत्यां प्रलयापदि।

अतोऽच्युतोऽखिले लोके स एक: सर्वगोऽव्यय: ॥

“सम्पूर्ण विराट जगत के प्रलय के बाद भी भगवद्भक्त कभी भी अपना निजी अस्तित्व नहीं खोते। भगवान् तथा उनके साथ रहने वाले भक्त इस जगत में तथा आध्यात्मिक जगत में सदैव शाश्वत हैं।”

 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥