श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक
पुरुषस्य च संस्थानं स्वरूपं वा परस्य च ।
ज्ञानं च नैगमं यत्तद्गुरुशिष्यप्रयोजनम् ॥ ३८ ॥
 
शब्दार्थ
पुरुषस्य—जीव का; च—भी; संस्थानम्—अस्तित्व; स्वरूपम्—पहचान; वा—या; परस्य—परम का; च—भी; ज्ञानम्— ज्ञान; च—भी; नैगमम्—उपनिषदों के विषय में; यत्—जो; तत्—वही; गुरु—गुरु; शिष्य—शिष्य; प्रयोजनम्—अनिवार्यता ।.
 
अनुवाद
 
 जीवों तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विषय में क्या क्या सच्चाइयाँ हैं? उनके स्वरूप क्या क्या हैं? वेदों में ज्ञान के क्या विशिष्ट मूल्य हैं और गुरु तथा उसके शिष्यों की अनिवार्यताएँ क्या हैं?
 
तात्पर्य
 सारे जीव स्वाभाविक रूप से भगवान् के दास हैं और भगवान् हर एक से सभी प्रकार की सेवाएँ स्वीकार कर सकते हैं। यह स्पष्ट घोषणा की गई है (भगवद्गीता ५.२९) कि भगवान् सारे यज्ञों तथा तपस्याओं के लाभों के परम भोक्ता, समस्त व्यक्त वस्तुओं के स्वामी तथा सारे जीवों के मित्र हैं। यही उनकी असली पहचान है। अतएव जब जीव भगवान् के इस परम स्वामित्व को स्वीकार करता है और उसी भाव से कार्य करता है, तो वह अपने असली स्वरूप को धारण कर लेता है। जीव को ज्ञान के इस मानदण्ड तक ऊपर उठाने के लिए आध्यात्मिक संगति की आवश्यकता होती है। प्रामाणिक गुरु की इच्छा होती है कि उसके शिष्य भगवान् की दिव्य सेवा करने की विधि जानें और शिष्य भी यह जानते हैं कि उन्हें किसी स्वरूपसिद्ध व्यक्ति से ईश्वर तथा जीव के नित्य सम्बन्ध के विषय में सीखना चाहिए। इस दिव्य ज्ञान का वितरण करने के लिए मनुष्य को वैदिक ज्ञान के प्रकाश के बल पर सांसारिक कार्यकलापों से अवकाश ले लेना चाहिए। इस श्लोक के सारे प्रश्नों का यही सार-समाहार है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥