श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक
अस्राक्षीद्भगवान् विश्वं गुणमय्यात्ममायया ।
तया संस्थापयत्येतद्भूय: प्रत्यपिधास्यति ॥ ४ ॥
 
शब्दार्थ
अस्राक्षीत्—उत्पन्न कराया; भगवान्—भगवान् ने; विश्वम्—ब्रह्माण्ड; गुण-मय्या—भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से समन्वित; आत्म—अपनी; मायया—शक्ति द्वारा; तया—उसके द्वारा; संस्थापयति—पालन करता है; एतत्—ये सब; भूय:—तब पुन:; प्रत्य्-अपिधास्यति—उल्टे विलय भी करता है ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् ने प्रकृति के तीन गुणों की स्वरक्षित शक्ति द्वारा इस ब्रह्माण्ड की सृष्टि कराई। वे उसी के द्वारा सृष्टि का पालन करते हैं और उल्टे पुन: पुन: उसका विलय भी करते हैं।
 
तात्पर्य
 भगवान् द्वारा इस विराट ब्रह्माण्ड की रचना उन जीवों के लिए की जाती है, जो नकल द्वारा भगवान् से एकाकार होने के भ्रान्त विचार में बह जाते हैं। प्रकृति के तीनों गुण बद्धजीवों के मोह को और भी बढ़ाने वाले हैं। बद्धजीव माया द्वारा मोहित होकर अपनी दिव्य पहचान की विस्मृति के कारण अपने को भौतिक सृष्टि का एक अंश मानता है और इस तरह वह जन्म-जन्मांतर भौतिक कार्यों में बँध जाता है। यह भौतिक जगत स्वयं भगवान् के निमित्त नहीं है, अपितु यह उन बद्धात्माओं के लिए है, जो ईश्वर-प्रदत्त अल्प स्वतंत्रता का दुरुपयोग करके नियंत्रक बनना चाहते हैं। इस तरह बद्धात्माओं की बारम्बार जन्म-मृत्यु होती रहती है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥