श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक
एतान्मे पृच्छत: प्रश्नान् हरे: कर्मविवित्सया ।
ब्रूहि मेऽज्ञस्य मित्रत्वादजया नष्टचक्षुष: ॥ ४० ॥
 
शब्दार्थ
एतान्—ये सारे; मे—मेरे; पृच्छत:—पूछने वाले के; प्रश्नान्—प्रश्नों को; हरे:—भगवान् की; कर्म—लीलाएँ; विवित्सया— जानने की इच्छा करते हुए; ब्रूहि—कृपया वर्णन करें; मे—मुझसे; अज्ञस्य—अज्ञानी की; मित्रत्वात्—मित्रता के कारण; अजया—बहिरंगा शक्ति द्वारा; नष्ट-चक्षुष:—वे जिनकी दृष्टि नष्ट हो चुकी है ।.
 
अनुवाद
 
 हे मुनि, मैंने आपके समक्ष इन सारे प्रश्नों को अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हरि की लीलाओं को जानने के उद्देश्य से ही रखा है। आप सबों के मित्र हैं, अतएव कृपा करके उन सबों के लाभार्थ जिनकी दृष्टि नष्ट हो चुकी हैं उनका वर्णन करें।
 
तात्पर्य
 विदुर ने भगवान् की प्रेमाभक्ति के सिद्धान्तों को समझने के उद्देश्य से नाना प्रकार के प्रश्न पूछे। जैसाकि भगवद्गीता (२.४१) में वर्णन हुआ है भगवान् की भक्ति अनन्य है और भक्त का मन अनिश्चितताओं की अनेक शाखाओं की ओर नहीं मुड़ता। विदुर का उद्देश्य भगवान् की उस सेवा में स्थिर बने रहना था जिसमें मनुष्य इधर-उधर भटके बिना लीन रहता है। उन्होंने मैत्रेय मुनि की मित्रता का दावा इसलिए नहीं किया कि वे मित्रा के पुत्र थे, किन्तु इसलिए किया कि मैत्रेय वस्तुत: उन सबों के मित्र थे जिन्होंने भौतिक प्रभाववश अपनी आध्यात्मिक दृष्टि खो दी है।
 
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥