श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 42
 
 
श्लोक
श्रीशुक उवाच
स इत्थमापृष्टपुराणकल्प: कुरुप्रधानेन मुनिप्रधान: ।
प्रवृद्धहर्षो भगवत्कथायां सञ्चोदितस्तं प्रहसन्निवाह ॥ ४२ ॥
 
शब्दार्थ
श्री-शुक: उवाच—श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा; स:—वह; इत्थम्—इस प्रकार; आपृष्ट—पूछे जाने पर; पुराण-कल्प:—जो वेदों के पूरकों (पुराणों) की व्याख्या करना जानता है; कुरु-प्रधानेन—कुरुओं के प्रधान द्वारा; मुनि-प्रधान:—प्रमुख मुनि; प्रवृद्ध—पर्याप्त रूप से समृद्ध; हर्ष:—सन्तोष; भगवत्—भगवान् की; कथायाम्—कथाओं में; सञ्चोदित:—इस तरह प्रेरित होकर; तम्—विदुर को; प्रहसन्—हँसते हुए; इव—मानो; आह—उत्तर दिया ।.
 
अनुवाद
 
 श्रीशुकदेव गोस्वामी ने कहा : इस तरह वे मुनियों में-प्रधान, जो भगवान् विषयक कथाओं का वर्णन करने के लिए सदैव उत्साहित रहते थे, विदुर द्वारा इस तरह प्रेरित किये जाने पर पुराणों की विवरणात्मक व्याख्या का बखान करने लगे। वे भगवान् के दिव्य कार्यकलापों के विषय में बोलने के लिए अत्यधिक उत्साहित थे।
 
तात्पर्य
 मैत्रेय मुनि जैसे महान् विद्वान मुनिगण भगवान् के दिव्य कार्यकलापों का वर्णन करने के लिए सदैव अत्यधिक उत्साहित रहते हैं। इस तरह बोले जाने के लिए विदुर द्वारा आमंत्रित किये जाने पर मैत्रेय मुनि हँसते से प्रतीत हुए, क्योंकि उन्हें वास्तव में दिव्य आनन्द की अनुभूति हुई।
 
इस प्रकार श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के अन्तर्गत “विदुर द्वारा अन्य प्रश्न” नामक सातवें अध्याय के भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुए।
 
 
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