श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक
भगवानेक एवैष सर्वक्षेत्रेष्ववस्थित: ।
अमुष्य दुर्भगत्वं वा क्लेशो वा कर्मभि: कुत: ॥ ६ ॥
 
शब्दार्थ
भगवान्—भगवान्; एक:—एकमात्र; एव एष:—ये सभी; सर्व—समस्त; क्षेत्रेषु—जीवों में; अवस्थित:—स्थित; अमुष्य— जीवों का; दुर्भगत्वम्—दुर्भाग्य; वा—या; क्लेश:—कष्ट; वा—अथवा; कर्मभि:—कार्यों द्वारा; कुत:—किसलिए ।.
 
अनुवाद
 
 भगवान् परमात्मा के रूप में हर जीव के हृदय में स्थित रहते हैं। तो फिर जीवों के कर्मों से दुर्भाग्य तथा कष्ट क्यों प्रतिफलित होते हैं?
 
तात्पर्य
 विदुर ने मैत्रेय से जो अगला प्रश्न पूछा, वह है—जीवों के हृदयों में परमात्मा रूप में भगवान् की उपस्थिति के बावजूद उन्हें इतने कष्ट तथा दुर्भाग्य क्यों झेलने पड़ते हैं? शरीर को फलवान वृक्ष माना जाता है और जीव तथा परमात्मा रूप में भगवान् उसमें बैठे दो पक्षियों के तुल्य हैं। व्यष्टि आत्मा उस वृक्ष का फल खा रहा है, किन्तु परमात्मा रूप भगवान् दूसरे पक्षी के कार्यों का साक्षी बना रहता है। राज्य का कोई नागरिक राज्य अधिकारी के पर्याप्त निरीक्षण के अभाव में कष्ट में रह सकता है, किन्तु यह कैसे सम्भव है कि राज्य के मुखिया के स्वयं उपस्थित रहने पर एक नागरिक अन्य नागरिकों द्वारा पीडि़त हो? दूसरी दृष्टि से यह समझा जाता है कि जीव गुणात्मक दृष्टि से भगवान् से एक है, अतएव जीवन की शुद्ध अवस्था में विशेष रूप से भगवान् की उपस्थिति में उसका ज्ञान अविद्या द्वारा प्रच्छ्न्न नहीं हो सकता। तो फिर जीव किस तरह अज्ञान के वशीभूत होता है और माया के प्रभाव से प्रच्छन्न हो जाता है? भगवान् हर जीव के पिता तथा रक्षक हैं और वे भूत-भृत अर्थात् जीवों के पालक कहलाते हैं। तो फिर जीवों को इतने कष्ट तथा दुर्भाग्य क्यों भोगने पड़ते हैं? ऐसा होना नहीं चाहिए, किन्तु वास्तव में हम देखते हैं कि सर्वत्र यही होता है। अत: विदुर ने इस प्रश्न का समाधान चाहा।
 
 
  All glories to saints and sages of the Supreme Lord.
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥