श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 7: विदुर द्वारा अन्य प्रश्न  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
सेयं भगवतो माया यन्नयेन विरुध्यते ।
ईश्वरस्य विमुक्तस्य कार्पण्यमुत बन्धनम् ॥ ९ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—मैत्रेय ने कहा; सा इयम्—ऐसा कथन; भगवत:—भगवान् की; माया—माया; यत्—जो; नयेन—तर्क द्वारा; विरुध्यते—विरोधी बन जाता है; ईश्वरस्य—भगवान् का; विमुक्तस्य—नित्य मुक्त का; कार्पण्यम्—अपर्याप्तता; उत—क्या कहा जाय, जैसा भी; बन्धनम्—बन्धन ।.
 
अनुवाद
 
 श्री मैत्रेय ने कहा : कुछ बद्धजीव यह सिद्धान्त प्रस्तुत करते हैं कि परब्रह्म या भगवान् को माया द्वारा जीता जा सकता है, किन्तु साथ ही उनका यह भी मानना है कि वे अबद्ध हैं। यह समस्त तर्क के विपरित है।
 
तात्पर्य
 कभी-कभी ऐसा लगता है कि भगवान् जो कि शत-प्रतिशत आध्यात्मिक हैं, उस मायाशक्ति के कारणस्वरूप नहीं हो सकते जो व्यष्टि आत्मा के ज्ञान को प्रच्छन्न कर देती है। किन्तु वास्तव में इसमें कोई सन्देह नहीं कि माया या बहिरंगा शक्ति भी भगवान् का अंश है। जब व्यासदेव ने भगवान् का साक्षात्कार किया, तो उन्होंने भगवान् को अपनी बहिरंगा शक्ति के साथ देखा जो व्यष्टि जीवों के शुद्ध ज्ञान को आवृत करती है। बहिरंगा शक्ति इस तरह क्यों कर्म करती है? इस पर निम्नवत् विचार किया जा सकता है, जैसाकि विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर तथा श्रील जीव गोस्वामी जैसे महान् टीकाकारों ने विश्लेषण किया है। यद्यपि भौतिक माया शक्ति आध्यात्मिक शक्ति से पृथक् होती है तथापि यह भगवान् की अनेक शक्तियों में से एक है और इस तरह प्रकृति के भौतिक गुण निश्चय ही, भगवान् के ही गुण हैं। शक्ति तथा शक्तिमान भगवान् पृथक्-पृथक् नहीं हैं। यद्यपि ऐसी शक्ति भगवान् के साथ एकाकार रहती है, किन्तु वे इससे कभी भी वशीभूत नहीं होते। यद्यपि सारे जीव भी भगवान् के विभिन्नांश हैं, किन्तु वे भौतिक शक्ति द्वारा पराजित हो जाते हैं। भगवान् का अचिन्त्य योगमैश्वरम्, जिसका वर्णन भगवद्गीता (९.५) में हुआ है कूपमंडूक दार्शनिकों द्वारा ठीक से नहीं समझा जाता। वे इस सिद्धान्त के समर्थन में कि नारायण (स्वयं भगवान्) दरिद्रनारायण बनते हैं, यह प्रस्ताव रखते हैं कि भौतिक शक्ति परमेश्वर को पराजित करती है। किन्तु श्रील जीव गोस्वामी तथा श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर इसकी व्याख्या में एक अति सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं कि यद्यपि सूर्य सर्वत: प्रकाश देता है, किन्तु बादल, अँधेरा तथा हिमपात ये सभी सूर्य के विभिन्नांश हैं। सूर्य के बिना बादलों या अंधकार से आकाश के आच्छादित होने की कोई सम्भावना नहीं रहती, न ही पृथ्वी पर हिमपात हो सकता है। यद्यपि सूर्य द्वारा जीवन का पालन होता है, किन्तु सूर्य द्वारा उत्पन्न अंधकार तथा हिमपात से जीवन विचलित भी होता है। किन्तु यह भी तथ्य है कि सूर्य स्वयं कभी भी अंधकार, बादल या हिमपात से पराजित नहीं होता। सूर्य ऐसे उपद्रवों से बहुत दूर रहता है। जो अल्पज्ञानी हैं, वे ही कहते हैं कि सूर्य बादल से या अंधकार से ढक जाता है। इसी तरह परब्रह्म भगवान् सदैव भौतिक शक्ति के प्रभाव से अप्रभावित रहते हैं यद्यपि यह उनकी शक्तियों में से एक है। (परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते) अत: माया द्वारा परब्रह्म के पराजित होने पर बल देने का कोई कारण नहीं है। बादल, अंधकार तथा हिमपात सूर्य की किरणों के एक नगण्य अंश को ही ढक सकते हैं। इसी तरह प्रकृति के गुण किरणों के सदृश जीवों पर प्रतिक्रिया कर सकते हैं। यह जीव का दुर्भाग्य है, जो अकारण नहीं है, कि भौतिक शक्ति उसकी शुद्ध चेतना तथा नित्य आनन्द पर प्रभाव डालती है। शुद्ध चेतना तथा नित्य आनन्द का इस तरह प्रच्छन्न होना अविद्याकर्मसंज्ञा के कारण है—वह शक्ति जो उन सूक्ष्म जीवों पर प्रभाव डालती है, जो अपनी अल्प स्वतंत्रता का दुरुपयोग करते हैं। विष्णुपुराण, भगवद्गीता तथा अन्य समस्त वैदिक ग्रन्थों के अनुसार सारे जीव भगवान् की तटस्था शक्ति द्वारा उत्पन्न होते हैं और इस तरह वे सभी सदैव भगवान् की शक्ति होते हैं, शक्तिमान नहीं। सारे जीव सूर्य की किरणों के समान हैं। जैसाकि ऊपर बताया जा चुका है, यद्यपि सूर्य तथा उसकी किरणों में कोई गुणात्मक अन्तर नहीं है, किन्तु कभी-कभी सूर्य की किरणें सूर्य की अन्य शक्ति, जिसका नाम बादल या हिमपात है, द्वारा पराजित हो जाती हैं। इसी तरह यद्यपि जीव गुणात्मक रूप से भगवान् की पराशक्ति के साथ एक हैं, किन्तु उनमें कनिष्ठा भौतिक शक्ति द्वारा पराजित होने की प्रवृत्ति होती है। वैदिक स्तोत्रों में कहा गया है कि सारे जीव अग्नि के स्फुलिंगों जैसे हैं। अग्नि के स्फुलिंग भी अग्नि होते हैं, किन्तु स्फुलिंगों की ज्वलन शक्ति मूल अग्नि से भिन्न होती है। जब स्फुलिंग मूल अग्नि से सम्पर्क तोड़ कर बाहर उड़ जाते हैं, तो वे अग्निविहीन वायुमण्डल से प्रभावित होते हैं। इस तरह वे स्फुलिंग के रूप में अग्नि के साथ अपनी शक्ति बनाये रखते हैं, किन्तु मूल अग्नि के रूप में नहीं। ये स्फुलिंग मूल अग्नि के भीतर शाश्वत रीति से उसके भिन्नांश के रूप में रह सकते हैं, किन्तु जिस क्षण ये स्फुलिंग मूल अग्नि से पृथक् हो जाते हैं तभी उनके दुर्भाग्य तथा कष्ट प्रारम्भ होते हैं। स्पष्ट निष्कर्ष यह निकला कि भगवान्, जो कि मूल अग्नि हैं, कभी पराजित नहीं होते, किन्तु अग्नि के सूक्ष्म स्फुलिंग माया के मोहक प्रभाव द्वारा पराजित हो सकते हैं। यह कहना अत्यन्त हास्यास्पद तर्क है कि भगवान् अपनी ही भौतिक शक्ति द्वारा पराजित होते हैं। भगवान् भौतिक शक्ति के स्वामी हैं, किन्तु जीव बद्ध अवस्था में भौतिक शक्ति द्वारा नियंत्रित होते हैं। यह भगवद्गीता का कथन है। वे कूपमण्डूक दार्शनिक जो यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि भगवान् सतोगुण द्वारा पराजित हो जाते हैं, वे स्वयं ही उसी भौतिक शक्ति द्वारा विमोहित रहते हैं, यद्यपि वे अपने आपको मुक्तात्माएँ मानते हैं। वे अपने तर्कों के समर्थन में मिथ्या तथा श्रमसाध्य वाग्जाल प्रस्तुत करते हैं, जो कि भगवान् की उसी मोहनी शक्ति का उपहार है। किन्तु बेचारे कूपमण्डूक दार्शनिक ज्ञान के मिथ्या विचार के कारण इस स्थिति को समझ नहीं सकते। श्रीमद्भागवत (६.९.३४) में कहा गया है—

दुरवबोध इव तवायं विहारयोगो यद् अशरणोऽशरीर इदम्अन्वेक्षितास्मत्समवाय आत्मनैवाविक्रियमाणेन सगुणम् अगुण: सृजसि पासि हरसि इस तरह देवताओं ने भगवान् से प्रार्थना की कि यद्यपि उनके कार्यकलापों को समझ पाना अतीव कठिन है, किन्तु जो लोग भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में निष्ठापूर्वक लगे हुए हैं, वे उन्हें कुछ-कुछ समझ सकते हैं। देवताओं ने स्वीकार किया कि यद्यपि भगवान् भौतिक प्रभाव या सृष्टि से पृथक् हैं, तो भी वे देवताओं के माध्यम से पूर्ण विराट जगत का सृजन, पालन तथा संहार करते हैं।

 
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