श्रीमद् भागवतम
 
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भागवत पुराण  »  स्कन्ध 3: यथास्थिति  »  अध्याय 8: गर्भोदकशायी विष्णु से ब्रह्मा का प्राकट्य  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक
मैत्रेय उवाच
सत्सेवनीयो बत पूरुवंशो
यल्लोकपालो भगवत्प्रधान: ।
बभूविथेहाजितकीर्तिमालां
पदे पदे नूतनयस्यभीक्ष्णम् ॥ १ ॥
 
शब्दार्थ
मैत्रेय: उवाच—श्रीमैत्रेय मुनि ने कहा; सत्-सेवनीय:—शुद्ध भक्तों की सेवा करने का पात्र; बत—ओह, निश्चय ही; पूरु- वंश:—राजा पूरु का वंश; यत्—क्योंकि; लोक-पाल:—राजा हैं; भगवत्-प्रधान:—भगवान् के प्रति मुख्य रूप से अनुरक्त; बभूविथ—तुम भी उत्पन्न थे; इह—इसमें; अजित—अजेय भगवान्; कीर्ति-मालाम्—दिव्य कार्यों की शृंखला; पदे पदे— प्रत्येक पग पर; नूतनयसि—नवीन से नवीनतर बनते हो; अभीक्ष्णम्—सदैव ।.
 
अनुवाद
 
 महा-मुनि मैत्रेय ने विदुर से कहा : राजा पूरु का राजवंश शुद्ध भक्तों की सेवा करने के लिए योग्य है, क्योंकि उस वंश के सारे उत्तराधिकारी भगवान् के प्रति अनुरक्त हैं। तुम भी उसी कुल में उत्पन्न हो और यह आश्चर्य की बात है कि तुम्हारे प्रयास से भगवान् की दिव्य लीलाएँ प्रतिक्षण नूतन से नूतनतर होती जा रही हैं।
 
तात्पर्य
 महा-मुनि मैत्रेय ने विदुर को धन्यवाद दिया और उनके वंश की ख्याति का सन्दर्भ देते हुए उनकी प्रशंसा की। पूरुवंश भगवद्भक्तों से भरापूरा था और इसके कारण महिमामंडित था। चूँकि वे लोग निर्विशेष ब्रह्म या अन्तर्यामी परमात्मा के प्रति अनुरक्त न होकर सीधे भगवान् अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम से जुड़े थे, अतएव वे भगवान् एवं उनके शुद्ध भक्तों की सेवा करने के योग्य थे। क्योंकि विदुर उसी वंश के वंशज थे, अत: स्वाभाविक था कि वे भगवान् के नित नूतन यश का दूर दूर तक विस्तार करने में लग गये। विदुर जैसे व्यक्ति की महिमामंडित संगति पाकर मैत्रेय आनन्दित थे। उन्होंने विदुर की संगति को अतीव वांछनीय माना, क्योंकि ऐसी संगति से मनुष्य की भक्तिमय सेवा की सुसुप्त प्रवृत्तियाँ त्वरायुक्त हो जाती हैं।
 
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